Thursday, January 24, 2019

गरुड़ पुराण में वर्णित नरक

गरुड़ पुराण में वर्णन है 36 नर्क का, जानिए किसमें कैसे दी जाती है सजा
हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखी अनेक कथाओं में स्वर्ग और नर्क के बारे में बताया गया है। पुराणों के अनुसार स्वर्ग वह स्थान होता है जहां देवता रहते हैं और अच्छे कर्म करने वाले इंसान की आत्मा को भी वहां स्थान मिलता है, इसके विपरीत बुरे काम करने वाले लोगों को नर्क भेजा जाता है, जहां उन्हें सजा के तौर पर गर्म तेल में तला जाता है और अंगारों पर सुलाया जाता है।
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हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण, कठोपनिषद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। आज हम आपको उन नर्कों के बारे में संक्षिप्त रूप से बता रहे हैं-
1. महावीचि- यह नर्क पूरी तरह रक्त यानी खून से भरा है और इसमें लोहे के बड़े-बड़े कांटे हैं। जो लोग गाय की हत्या करते हैं, उन्हें इस नर्क में यातना भुगतनी पड़ती है।
2. कुंभीपाक- इस नर्क की जमीन गरम बालू और अंगारों से भरी है। जो लोग किसी की भूमि हड़पते हैं या ब्राह्मण की हत्या करते हैं। उन्हें इस नर्क में आना पड़ता है।
3. रौरव- यहां लोहे के जलते हुए तीर होते हैं। जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इन तीरों से बींधा जाता है।
4. मंजूष- यह जलते हुए लोहे जैसी धरती वाला नर्क है। यहां उनको सजा मिलती है, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं या कैद में रखते हैं।
5. अप्रतिष्ठ- यह पीब, मूत्र और उल्टी से भरा नर्क है। यहां वे लोग यातना पाते हैं, जो ब्राह्मणों को पीड़ा देते हैं या सताते हैं।
6. विलेपक- यह लाख की आग से जलने वाला नर्क है। यहां उन ब्राह्मणों को जलाया जाता है, जो शराब पीते हैं।
7. महाप्रभ- इस नर्क में एक बहुत बड़ा लोहे का नुकीला तीर है। जो लोग पति-पत्नी में फूट डालते हैं, पति-पत्नी के रिश्ते तुड़वाते हैं वे यहां इस तीर में पिरोए जाते हैं।
8. जयंती- यहां जीवात्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। जो लोग पराई औरतों के साथ संभोग करते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
9. शाल्मलि- यह जलते हुए कांटों से भरा नर्क है। जो औरत कई पुरुषों से संभोग करती है व जो व्यक्ति हमेशा झूठ व कड़वा बोलता है, दूसरों के धन और स्त्री पर नजर डालता है। पुत्रवधू, पुत्री, बहन आदि से शारीरिक संबंध बनाता है व वृद्ध की हत्या करता है, ऐसे लोगों को यहां लाया जाता है।
10. महारौरव- इस नर्क में चारों तरफ आग ही आग होती है। जैसे किसी भट्टी में होती है। जो लोग दूसरों के घर, खेत, खलिहान या गोदाम में आग लगाते हैं, उन्हें यहां जलाया जाता है।
11. तामिस्र- इस नर्क में लोहे की पट्टियों और मुग्दरों से पिटाई की जाती है। यहां चोरों को यातना मिलती है।
12. महातामिस्र- इस नर्क में जौंके भरी हुई हैं, जो इंसान का रक्त चूसती हैं। माता, पिता और मित्र की हत्या करने वाले को इस नर्क में जाना पड़ता है।
13. असिपत्रवन- यह नर्क एक जंगल की तरह है, जिसके पेड़ों पर पत्तों की जगह तीखी तलवारें और खड्ग हैं। मित्रों से दगा करने वाला इंसान इस नर्क में गिराया जाता है।
14. करम्भ बालुका- यह नर्क एक कुएं की तरह है, जिसमें गर्म बालू रेत और अंगारे भरे हुए हैं। जो लोग दूसरे जीवों को जलाते हैं, वे इस कुएं में गिराए जाते हैं।
15. काकोल- यह पीब और कीड़ों से भरा नर्क है। जो लोग छुप-छुप कर अकेले ही मिठाई खाते हैं, दूसरों को नहीं देते, वे इस नर्क में लाए जाते हैं।
16. कुड्मल- यह मूत्र, पीब और विष्ठा (उल्टी) से भरा है। जो लोग दैनिक जीवन में पंचयज्ञों ( ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) का अनुष्ठान नहीं करते वे इस नर्क में आते हैं।
17. महाभीम- यह नर्क बदबूदार मांस और रक्त से भरा है। जो लोग ऐसी चीजें खाते हैं, जिनका शास्त्रों ने निषेध बताया है, वो लोग इस नर्क में गिरते हैं।
18. महावट- इस नर्क में मुर्दे और कीड़े भरे हैं, जो लोग अपनी लड़कियों को बेचते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
19. तिलपाक- यहां दूसरों को सताने, पीड़ा देने वाले लोगों को तिल की तरह पेरा जाता है। जैसे तिल का तेल निकाला जाता है, ठीक उसी तरह।
20. तैलपाक- इस नर्क में खौलता हुआ तेल भरा है। जो लोग मित्रों या शरणागतों की हत्या करते हैं, वे यहां इस तेल में तले जाते हैं।
21. वज्रकपाट- यहां वज्रों की पूरी श्रंखला बनी है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते हैं, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं।
22. निरुच्छवास- इस नर्क में अंधेरा है, यहां वायु नहीं होती। जो लोग दिए जा रहे दान में विघ्न डालते हैं वे यहां फेंके जाते हैं।
23. अंगारोपच्य- यह नर्क अंगारों से भरा है। जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं। वे यहां जलाए जाते हैं।
24. महापायी- यह नर्क हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य बोलने वाले यहां औंधे मुंह गिराए जाते हैं।
25. महाज्वाल- इस नर्क में हर तरफ आग है। जो लोग हमेशा ही पाप में लगे रहते हैं वे इसमें जलाए जाते हैं।
26. गुड़पाक- यहां चारों ओर गरम गुड़ के कुंड हैं। जो लोग समाज में वर्ण संकरता फैलाते हैं, वे इस गुड़ में पकाए जाते हैं।
27. क्रकच- इस नर्क में तीखे आरे लगे हैं। जो लोग ऐसी महिलाओं से संभोग करते हैं, जिसके लिए शास्त्रों ने निषेध किया है, वे लोग इन्हीं आरों से चीरे जाते हैं।
28. क्षुरधार- यह नर्क तीखे उस्तरों से भरा है। ब्राह्मणों की भूमि हड़पने वाले यहां काटे जाते हैं।
29. अम्बरीष- यहां प्रलय अग्रि के समान आग जलती है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।
30. वज्रकुठार- यह नर्क वज्रों से भरा है। जो लोग पेड़ काटते हैं वे यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।
31. परिताप- यह नर्क भी आग से जल रहा है। जो लोग दूसरों को जहर देते हैं या मधु (शहद) की चोरी करते हैं, वे यहां जलाए जाते हैं।
32. काल सूत्र- यह वज्र के समान सूत से बना है। जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं। वे यहां सजा पाते हैं।
33. कश्मल- यह नर्क नाक और मुंह की गंदगी से भरा होता है। जो लोग मांसाहार में ज्यादा रुचि रखते हैं, वे यहां गिराए जाते हैं।
34. उग्रगंध- यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नर्क है। जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते, वे यहां लाए जाते हैं।
35. दुर्धर- यह नर्क जौक और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नर्क में भेजे जाते हैं।
36. वज्रमहापीड- यहां लोहे के भारी वज्र से मारा जाता है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, किसी प्राणी की हत्या कर उसे खाते हैं, दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्र चुराते हैं, जो दूसरों के फल चुराते हैं, धर्म को नहीं मानते ऐसे सारे लोग यहां लाए जाते हैं।
नमः शिवाय

Wednesday, January 23, 2019

माघ स्नान की महिमा

.                       "माघ स्नान माहात्म्य"


          'पद्म पुराण' के उत्तर खण्ड में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि व्रत, दान व तपस्या से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में ब्राह्ममुहूर्त में उठकर स्नानमात्र से होती है।

               व्रतैर्दानस्तपोभिश्च  न  तथा  प्रीयते  हरिः।
               माघमज्जनमात्रेण यथा प्रीणाति केशवः।।

          अतः सभी पापों से मुक्ति व भगवान की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान व्रत करना चाहिए। इसका प्रारम्भ पौष की पूर्णिमा से होता है।
          माघ मास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहाँ कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है। इस मास की प्रत्येक तिथि पर्व हैं। कदाचित् अशक्तावस्था में पूरे मास का नियम न ले सकें तो शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था की है तीन दिन अथवा एक दिन अवश्य माघ-स्नान व्रत का पालन करें। इस मास में स्नान, दान, उपवास और भगवत्पूजा अत्यन्त फलदायी है।
          माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'षटतिला एकादशी' के नाम से जानी जाती है। इस दिन काले तिल तथा काली गाय के दान का भी बड़ा माहात्म्य है।
1. तिल मिश्रित जल से स्नान, 2. तिल का उबटन, 3. तिल से हवन, 4. तिलमिश्रित जल का पान व तर्पण, 5. तिलमिश्रित भोजन, 6. तिल का दान। ये छः कर्म पाप का नाश करने वाले हैं।
          माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या 'मौनी अमावस्या' के रूप में प्रसिद्ध है। इस पवित्र तिथि पर मौन रहकर अथवा मुनियों के समान आचरणपूर्वक स्नान दान करने का विशेष महत्त्व है।
          अमावस्या के दिन (04 फरवरी) सोमवार का योग होने पर उस दिन देवताओं को भी दुर्लभ हो ऐसा पुण्यकाल होता है, क्योंकि गंगा, पुष्कर एवं दिव्य अंतरिक्ष और भूमि के जो सब तीर्थ हैं, वे 'सोमवती (दर्श) अमावस्या' के दिन के जप, ध्यान, पूजन करने पर विशेष धर्मलाभ प्रदान करते हैं।
          मंगलवारी चतुर्थी, रविवारी सप्तमी, बुधवारी अष्टमी, सोमवारी अमावस्या, ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं। इनमें किया गया स्नान, दान व श्राद्ध अक्षय होता है।
          माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् 'वसंत पंचमी' को माँ सरस्वती का आविर्भाव-दिवस माना जाता है। इस दिन (10 फरवरी) प्रातः सरस्वती-पूजन करना चाहिए। पुस्तक और लेखनी (कलम) में भी देवी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है, अतः उनकी भी पूजा की जाती है।
          शुक्ल पक्ष की सप्तमी को 'अचला सप्तमी' कहते हैं। षष्ठी के दिन एक बार भोजन करके सप्तमी (12 फऱवरी) को सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से पापनाश, रूप, सुख-सौभाग्य और सदगति प्राप्त होती है।
          ऐसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है, तथापि उनमें भी माघी पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। इस दिन (19 फरवरी) स्नानादि से निवृत्त होकर भगवत्पूजन, श्राद्ध तथा दान करने का विशेष फल है। जो इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर भगवान विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है।
          माघी पूर्णिमा के दिन तिल, सूती कपड़े, कम्बल, रत्न, पगड़ी, जूते आदि का अपने वैभव के अनुसार दान करके मनुष्य स्वर्गलोक में सुखी होता है। 'मत्स्य पुराण' के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है

Sunday, January 20, 2019

माँ

मां एक ऐसा शब्द जो कि अपने आप में परिपूर्ण शब्द है |मां हमारे अस्तित्व का मूल कारण है |मां हमारी पैदाइश में भगवान की साझेदार है |हमने भगवान को नही देखा है न ही छुआ है परंतु अगर भगवान मिलते तो शायद मां के जैसा ही व्यवहार करते|जब एक बच्चा पैदा होता है तो वह रोने के अलावा कुछ नहीं जानता|मां उसे धीरे धीरे हर चीज़ सिखाती है |जब एक मां गर्भ धारण करती है तो वह केवल नये प्राणी को अस्तित्व में लाने का प्रयास ही नहीं करती अपितु वह अपने शरीर  का भी बलिदान करती है |गर्भ में बच्चा मां से रक्त, मांस, विचार और व्यवहार लेता है |जब कोई स्त्री गर्भवती होती है तो उसे अनेक प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं जो कि दुनियां का कोई भी पुरुष नही सह सकता |फिर भी मां हसते हसते सब सहकर नये प्राणी को अस्तित्व में लाती है |संसार में जितने भी जीव हैं सब किसी न किसी मां की कोख से ही जन्म प्राप्त करते हैं |बिना मां के किसी का जन्म संभव ही नहीं है |जब एक जीव जन्म लेताहै तो उसे रोने के सिवा कुछ भी नहीं आता है |मां अपने नवजात शिशु की हर आवश्यकता का खयाल रखती है |बच्चा बोल नहीं पाता कि उसे क्या चाहिये पर मां समझ जाती है |बच्चे की भूख, प्यास, तकलीफ सब मां तुरंत समझ जाती है |बच्चा कब क्या चाहता है यह बात केवल मां समझती है |जो वात्सल्य हमें मां की गोंद में मिलता है धरती पर कहीं नही मिल सकता |हमारे धर्मग्रंथों में भी मां के महत्व को सर्वोपरि बताया गया है |हमारे धर्मग्रंथ बताते हैं कि मां प्रथम गुरू है, मां भगवान है, मां की सेवा से सम्पूर्ण देवी देवता की सेवा का फल प्राप्त हो जाता है |
दुनिया में कोई आपकी मुस्कान के लिए अपनी कुर्बानी दे सकता है तो वह केवल मां है |
दुनियां केवल मां ही है जो आपके हर अपराध को क्षमा कर देती है |
दुनिया में मां ही है जो तुम्हारी खुशी के लिए अपनी जिंदगी तक की कुर्बानी हंसकर दे देती है |
आजकल विशेषरूप से शहरों में वृद्धाश्रम की भरमार हो गयी है | वृद्धाश्रम हमारी सभ्यता पर कलंक है |जिससे हमें रूप रंग तन मन धन जीवन आचार विचार व्यवहार स्वभाव प्रभाव मिला हमारे घरों में उनकी ही जगह न रही|जिस मां ठंड गरम की परवाह किये बिना तुम्हें दुलारों से पाला उसके तुम वृद्धाश्रम छोड़ आये |मां को त्यागने वालों उसके दूध से जो तुम्हारा पोषण हुआ उसे कैसे त्याग सकते हो |जिसने तुम्हें पलकों पर रखा तुम उसे वृद्धाश्रम में रखते हो|
जिसने अपनी माँ के चरणों में प्रणाम कर लिया उसे किसी मंदिर में जाने की जरूरत नहीं है |मां की गोद का सुख लेने के लिए हमारा भगवान गोकुल में पैदा होता है |दुनियां में मां की गोंद से पवित्र कोई जगह नहीं है |धरती पर मां के चरणों से पूजनीय दूसरी जगह नहीं है |मां के हाथों के कोमल स्पर्श से बढकर कोई सुख नहीं है |मां की सिखाई बातों से बढकर कोई शिक्षा नहीं है |
मां से बढकर कोई गुरू नहीं है |मां इतना कुछ हमे देती है और बदले में कुछ भी नहीं चाहती | जिसकी दुआ केवल हमारे लिए होती है |
कैसी विडम्बना है कि लोग लड़की के प्यार में पागल होकर आत्महत्या कर लेते हैं परंतु मां के लिए जरा सा कष्ट नहीं उठा सकते|बड़े भाग्यवान हैं वो लोग जिन्हें मां मिली मां का प्यार मिला |वे सभी लोग जिनकी मां है अपनी माँ को सम्मान दें प्यार दे भगवान उनका विशेष खयाल रखेगा |
जय हिंद जय भारत जय श्री राम |

Wednesday, January 16, 2019

पारिजात वृक्ष

!!! पारिजात वृक्ष : इस वृक्ष के कारण हुआ था इंद्र और कृष्ण में युद्ध !!!

पारिजात वृक्ष तो पुरे भारत में पाये जाते है, लेकिन किंटूर में पाया जाने वाला यह पारिजात वृक्ष अपने आप कई विशेषताए रखता है और यह अपनी तरह का पुरे भारत में इकलौता पारिजात वृक्ष है।

उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिला मुख्यालय से ३८ किलोमीटर कि दूरी पर किंटूर गाँव है।

इस जगह का नामकरण पाण्डवों कि माता कुन्ती के नाम पर हुआ है। यहाँ पर पाण्डवों ने माता कुन्ती के साथ अपना अज्ञातवास बिताया था।

इसी किंटूर गाँव में भारत का एक मात्र पारिजात का पेड़ पाया जाता है। कहते है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से सारी थकान मिट जाती है |

*** पारिजात वृक्ष के बारे में -

आमतौर पर पारिजात वृक्ष १० फीट  से २५ फीट तक ऊंचे होता है, पर किंटूर में स्तिथ पारिजात वृक्ष लगभग ४५ फीट ऊंचा और ५० फीट मोटा है।

इस पारिजात वृक्ष कि सबसे बड़ी विशेषता यह है कि, यह अपनी तरह का  इकलौता पारिजात वृक्ष है, क्योंकि इस पारिजात वृक्ष पर बीज नहीं लगते है तथा इस पारिजात वृक्ष कि कलम बोने से भी दूसरा वृक्ष तैयार नहीं होता है।

पारिजात वृक्ष  पर जून के आस पास बेहद खूबसूरत सफ़ेद रंग के फूल खिलते है। पारिजात के फूल केवल रात कि खिलते है और सुबह होते ही मुरझा जाते है। 

इन फूलों का लक्ष्मी पूजन में विशेष महत्तव है। पर एक बात ध्यान रहे कि पारिजात वृक्ष के वे ही फूल पूजा में काम लिए जाते है जो वृक्ष से टूट कर गिर जाते है, वृक्ष से फूल तोड़ने कि मनाही है।

पारिजात वृक्ष का वर्णन हरिवंश पुराण में भी आता है। हरिवंश पुराण में इसे कल्पवृक्ष कहा गया है जिसकी उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी और जिसे इंद्र ने स्वर्गलोक में स्थपित कर दिया था।

हरिवंश पुराण के अनुसार इसको छूने मात्र से ही देव नर्त्तकी उर्वशी कि थकान मिट जाती थी।

*** पारिजात वृक्ष के किंटूर पहुंचने की कहानी !!!

एक बार देवऋषि नारद जब धरती पर कृष्ण से मिलने आये तो अपने साथ पारिजात के सुन्दर पुष्प ले कर आये।  उन्होंने वे पुष्प श्री कृष्ण को भेट किये।

श्री कृष्ण ने पुष्प साथ बैठी अपनी पत्नी रुक्मणि को दे दिए।

लेकिन जब श्री कृष्ण कि दूसरी पत्नी सत्य भामा को पता चला कि स्वर्ग से आये पारिजात के सारे पुष्प श्री कृष्ण ने रुक्मणि को दे दिए तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने श्री कृष्ण के सामने जिद पकड़ ली कि, उन्हें अपनी वाटिका के लिय  पारिजात वृक्ष चाहिए। 

श्री कृष्ण के लाख समझाने पर भी सत्य भामा नहीं मानी।

सत्यभामा कि ज़िद के आगे झुकते हुए श्री कृष्ण ने अपने दूत को स्वर्ग पारिजात वृक्ष लाने के लिए भेजा पर इंद्र ने पारिजात वृक्ष देने से मना कर दिया। 

दूत ने जब यह बात आकर श्री कृष्ण को बताई तो उन्होंने स्व्यं ही इंद्र पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को पराजित करके पारिजात वृक्ष को जीत लिया।

इससे रुष्ट होकर इंद्र ने पारिजात वृक्ष को फल से वंचित हो जाने का श्राप दे दिया और तभी से पारिजात वृक्ष फल विहीन हो गया।

श्री कृष्ण ने पारिजात वृक्ष को ला कर सत्यभामा कि वाटिका में रोपित कर दिया, पर सत्यभामा को सबक सिखाने के लिया ऐसा कर दिया कि, जब पारिजात वृक्ष पर पुष्प आते तो गिरते वो रुक्मणि कि वाटिका में। 

और यही कारण है कि, पारिजात के पुष्प वृक्ष के नीचे न गिरकर वृक्ष से दूर गिरते है। इस तरह पारिजात वृक्ष , स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गया।

*** महाभारत काल से किंटूर के पारिजात वृक्ष का संबंध !!!

इसके बाद जब पाण्डवों ने किंटूर में अज्ञातवास किया तो उन्होंने वहाँ माता कुन्ती के लिए भगवन शिव के एक मंदिर कि स्थापना कि जो कि, अब कुन्तेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। 

कहते है कि, माता कुन्ती पारिजात के पुष्पों से भगवान् शंकर कि पूजा अर्चना कर सके इसलिए पांडवों ने सत्यभामा कि वाटिका से पारिजात वृक्ष को लाकर यहाँ स्थापित कर दिया और तभी से पारिजात वृक्ष यहाँ पर है।

*** अन्य किवंदतियां भी है पारिजात वृक्ष के बारे में !!!

एक अन्य मान्यता यह भी है कि, पारिजात नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी, जिसे भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था।

लेकिन अथाग प्रयास करने पर भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्रेम कों स्वीकार नहीं किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने आत्महत्या कर ली।

जिस स्थान पर पारिजात की क़ब्र बनी, वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया।

*** सरकार द्वारा पारिजात वृक्ष पर जारी डाक टिकट !!!

पारिजात वृक्ष के ऐतिहासिक महत्तव व इसकी दुर्लभता को देखते हुए सरकार ने इसे संरक्षित घोषित कर दिया है। भारत सरकार ने इस पर एक डाक टिकट भी जारी किया है।

*** औषधीय गुणों से भी भरपूर है पारिजात वृक्ष !!!

पारिजात को आयुर्वेद में हरसिंगार भी कहा जाता है। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलों के रस का सेवन किया जाए तो हृदय रोग से बचा जा सकता है।

इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खाँसी ठीक हो जाती है।

इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते हैं।

पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोंपल को यदि पाँच काली मिर्च के साथ महिलाएँ सेवन करें तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है।

वहीं पारिजात के बीज जहाँ बालों के लिए शीरप का काम करते हैं तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर दे|

Monday, January 14, 2019

जानिये क्या है फिलिप कोटलर पुरस्कार Philip Kotler Award

फिलिप कोटलर Phillip Kotler


फिलिप कोटलर, जिन्हें 'आधुनिक विपणन के पिता' के रूप में भी जाना जाता है, नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी, केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में मार्केटिंग के प्रोफेसर हैं। वह 60 से अधिक मार्केटिंग पुस्तकों के विश्व-प्रसिद्ध लेखक भी हैं, जिसमें बेस्टसेलिंग बुक प्रिंसिपल्स ऑफ मार्केटिंग भी शामिल है।

प्रबंधन और विपणन पर पुस्तकों के अलावा, 87 वर्षीय ने शिक्षा, पर्यावरण, सरकारी विपणन, स्वास्थ्य सेवा, आतिथ्य और नवाचार पर भी विस्तार से लिखा है।

वह अमेरिकन मार्केटिंग एसोसिएशन से "लीडर इन मार्केटिंग थॉट" पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति थे और अपने शानदार करियर में 22 मानद उपाधियाँ प्राप्त की।


पुरस्कार के बारे में -
विपणन और प्रबंधन के क्षेत्र में महारत हासिल करने के लिए कोटलर अवार्ड का विकास किया गया। यह दुनिया भर के विभिन्न उद्योगों में संगठनों, विपणन टीमों और व्यक्तियों की उपलब्धियों को पहचानता है और मनाता है

यह पुरस्कार, जो कि आधुनिक विपणन के पिता, फिलिप कोटलर को एक श्रद्धांजलि है, का उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों और कंपनियों के उदाहरणों का प्रसार करना है जो किसी उद्योग या देश की आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी प्रगति के लिए अभिनव संस्कृति का निर्माण करते हैं।

व्यक्तियों और कंपनियों को सम्मानित करने के अलावा, पुरस्कार नई प्रतिभाओं और अद्वितीय नवाचारों को प्रदर्शित करने के लिए एक मंच के रूप में भी काम करता है जो एक उद्योग में उच्च मानकों को निर्धारित करता है।

Saturday, January 12, 2019

हिंदुत्व - एक जीवनपद्धति

हिंदुत्व - एक जीवनपद्धति

आज से लगभग 6000 वर्ष पहले सम्पूर्ण विश्व में केवल एक ही धर्म था जिसका नाम सनातन धर्म धर्म था और जिसे वैदिक धर्म भी कहा जाता था | सनातन वैदिक धर्म का सीधा मतलब यही था कि  वेदों में बताये गये तरीके से जीवन जीना | वैदिक मार्ग जो जो मानव जीवन को हर तरह से उत्कर्ष पर ले जाने का एकमात्र माध्यम था और है | तब सम्पूर्ण विश्व में केवल दो जातियाँ थी एक आर्य जो वेदमार्गी थे दूसरे अनार्य जो वेद का अनुसरण नही करते थे |
सवाल उठता है की वेद क्या हैं?  इन्हें किसने लिखा?
वेद जो कि सनातन धर्म का मूल हैं सर्वशक्तिमान ईश्वर से अपने आप प्रकट ग्रंथ हैं जिनका रचयिता कोई नहीं है वे परमात्मा से प्रकट भगवद् अंश हैं | लोगों में गलतफहमी है कि महर्षि वेद व्यास जी ने वेदों की रचना की |जबकि सत्यता यह है कि वेद महर्षि वेद व्यास के जन्म के हजारों लाखों साल पहले से ही उपलब्ध हैं |हमारी परम्परा में वेदों को भगवान से उत्पन्न होने के कारण वेद भगवान कहा जाता है उसमें कही गयी हर बात को भगवान की बात माना जाता है |
चूंकि वेदमार्ग का पालन कठिन है और मानवता की सहज प्रवृति है कि सरल की तरफ आकर्षित होना इसलिए लोग वेदमार्ग को त्यागते गये|
हमारे वेद सम्पूर्ण ज्ञान विज्ञान के उद्गम स्थल हैं | वेदों से अनेक उपनिषद निकले हैं | वेदों से अठारह पुराण निकले हैं | अनेक अन्य ग्रंथ जो कि हमारे महान विद्वान महर्षियों द्वारा रचे गये हैं वे वेदों को प्रमाण मानकर ही लिखे गये हैं | जो ज्ञान विज्ञान पूर्व में रहा, या वर्तमान में है अथवा भविष्य में होगा अगर हम खोज सकें तो वेदों में पहले से मिलेगा| चूंकि वेद संस्कृत भाषा में हैं और संस्कृत भाषा के प्रामाणिक विद्वानो की दिनोदिन कमी हो रही है अत: वेदों को पढना समझना बहुत कठिन है |कुछ लोग अनर्गल व्याख्या करके उसमें त्रुटि पैदा करने का षडयंत्र रच रहे हैं |
अनेक आघातों को सहते हुये भी हमारी संस्कृति हमारी परंपरा अगर अबतक बची है तो उसका एकमात्र कारण है हमारी अत्यंत पवित्र गुरू शिष्य परंपरा |गुरू शिष्य परंपरा में गुरू अपने योग्य शिष्य को योग्यतानुसार अपने आचार्यों से प्राप्त तथा खुद के आत्मचिंतन से तैयार ज्ञान विज्ञान अपने शिष्य को प्रदान करता है तथा शिष्य उसे कालक्रम में आगे बढाता है | मैकाले ने इस परंपरा को सुनियोजित तरीके से खत्म करने का षडयंत्र रचा जिसके तहत आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली विकसित की गयी|
विंध्याचल और हिमालय पर्वत के बीच की जगह को प्राचीन काल में आर्यावर्त कहा जाता था हिमालय के उत्तर को सिंध कहा जाता था | जब अंग्रेज आये तो उन्होने हिमालय और हिंद महासागर के बीच के क्षेत्र को हिंद कहा और यहां पर रहने वाले लोगों को हिंदू कहा हिंद शब्द धीरे धीरे इंड हो गया और इस इस क्षेत्र का नाम इंडिया हो गया |
हिंदू जो कि मूल रूप से सनातन धर्म की आधुनिक रूपांतरण है और हिंदुत्व उस महान परंपरा की जीवन शैली है| हमारे धर्म ग्रंथों में जीवन के हर पहलू को वैज्ञानिक, सामाजिक, सामयिक और तार्किक तरीके से समझाया गया है | हमारे ग्रंथ हमें सुबह सोकर उठने से लेकर रात में सोने तक कौन सा कार्य कैसे करना है बताते हैं |हमें कैसे सोना चाहिए, कैसे जागना चाहिए, कैसे बोलना चाहिए, कैसे सुनना चाहिए, कैसे चलना चाहिए , कैसे रूकना चाहिये ,कैसे खाना चाहिये, क्या खाना चाहिए, क्यों खाना चाहिए, किससे दूर रहना चाहिए, किसके संग रहना चाहिए, कब कब क्या करना चाहिए, कब कब क्या क्या नहीं करना चाहिए आदि अनेक बातों को अत्यंत वैज्ञानिक आधार पर बताते हैं |हमारे यहां पानी पीने खाना खाने से लेकर मलमूत्र विसर्जन तक की विधि ग्रंथों में बताई गयी है |हमारे पूर्वज इसी परंपरा से जीवन जीने के अभ्यस्त थे जिन्हें हिंदू तथा जिनकी जीवन पद्धति को हिन्दुत्व कहा गया |हमारी हिंदुत्व परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन परंपरा है |दुनिया की समस्त सभ्यताओं ने हमसे कुछ न कुछ सीखा जरूर है | हमारी सभ्यता दुनिया में सबसे ज्यादा आघात सहने वाली सभ्यता है |दुनिया में कितनी सभ्यतायें बनी और मिट गयीं एक मात्र हिंदुत्व की सभ्यता है जो सनातन काल से आजतक अपना गौरव बचाने में समर्थ रही है जो कि श्रेष्ठ है |
हमारी सामर्थ्य का प्रमाण यह है कि हम अनंत आघातो को सहकर भी बचे हैं |
विश्व में कोई सभ्यता तभी चिर काल तक टिकती है जब वह वैज्ञानिक, तार्किक, दार्शनिक, भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और सामयिक परिस्थितियों को आत्मसात कर अपनी प्रासंगिकता को प्रमाणित करती है और हमारा हिन्दुत्व इसपर शत् प्रतिशत खरा उतरता है |
हमारी समृद्धि का प्रमाण यह है कि विश्व की समस्त सभ्यताओं ने हमसे कुछ न कुछ सीखा जरूर है |
हमरी श्रेष्ठता का प्रमाण यह है कि सबने हमको मिटाने की कोशिश की परंतु हम बचे हैं |
हमारी सहिष्णुता का प्रमाण यह है कि हमने किसी पर आक्रमण नही किया |
हमारी उदारता का प्रमाण यह है कि हमने सबको स्वीकार किया |
जहां आज तथाकथित आधुनिक पश्चिमी सभ्यता दुनिया को बाजार मानती है वहीं हमारा हिंदुत्व दुनिया को परिवार मानता है |हिंदू दुनिया की एकमात्र ऐसी कौम है जो समस्त धर्मों के धर्मस्थलों पर जाती है सबको समान आदर देती है |हमारे यहाँ पेड़ पौधे पर्वत पठार पशु पक्षी नदी सागर स्त्री पुरुष सबको भगवान मानकर पूजा जाता है |हम विश्व बंधुत्व की अवधारणा को मानते हैं |हमने कण कण में भगवान को माना है |हमारे यहाँ अनेक मान्यताएँ है सगुण भी निर्गुण भी, मायावादी भी हैं तत्ववादी भी सबको बराबर सम्मान मिलता है |अनंत काल से अनेक सभ्यतायें बनी और नष्ट हुईं परंतु सनातन वैदिक सभ्यता जिसे कालांतर में हिंदुत्व कहा गया तब भी थी आज भी है और भविष्य में भी रहेगी |हमें अपने हिंदू होने पर और अपने हिंदुत्व पर गौरवान्वित होना चाहिए |

Thursday, January 10, 2019

Shri Ram is the today's most relevant relevance

In the Hindu way, Ram is the culmination of the ideal. He is the peak pillar of our faith. Nobody ignores Ram.In the whole world, Lord Rama is the highest peak in the form of an undisputed standard of ideal, the ideal set by which it is exemplary for everyone.
Today the family is breaking down, the brother and brother has become the enemy, the son does not respect the parents, the only solution is that we follow the ideals established by Shri Ram Ji. Lord Shree Ram is also called as 'Maryada Purushottam' because he has perfected and established many family, political, social, religious and moral responsibilities in ideal way. When Lord Rama is the king, then do not even take a moment to abandon his wife,when Lord Rama is a husband he never see other women throughout life, Lord Ram also establishes an ideal in the form of a brother, how does friendship play Lord Rama Teaches us.When Lord Ram is a judge then he does not make any difference in normal people and Laxman.
Hindus consider them as adorable; other religions even accept them as least a great man. In total, the acceptance of Ram is everywhere, which is very necessary in today's life. Every Indian sees Lord Ram as an ideal adoration, who did not use his divine Bhagavadian powers throughout his life and lived as a normal humanity.
The ideal established by Ram Ji in today's times is very relevant and very important.
We have to be good friends so Ram is important
We have to become good sons, then Ram is necessary.
We have to become good father so Ram is necessary
We need to become a good husband, then Ram is necessary.
We have to be good friends so Ram is important
We need to be a good leader, then Ram is necessary.
We need to be a good judge, then Ram is necessary.
We have to become good rulers so Ram is necessary
If we are to become the best person then Ram is necessary.
Jai Shri Ram |

Insurance is not investment

  Insurance is not investment. Insurance and investments are two different financial instruments that serve different purposes. Insurance ...