Thursday, March 14, 2019

अजीम प्रेम जी ने किया बहुत बड़ा दान

भारतीय समूह विप्रो लिमिटेड के अरबपति चेयरमैन अजीम प्रेमजी, परोपकारी गतिविधियों का समर्थन करने के लिए 7.5 बिलियन डॉलर की कंपनी में 34 प्रतिशत शेयर देंगे, जो भारतीय इतिहास में सबसे उदार दान है।
फाउंडेशन द्वारा प्रेमजी द्वारा नियंत्रित शेयरों को अपरिवर्तनीय रूप से त्याग दिया गया है और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के लिए रखा गया है, फाउंडेशन ने बुधवार को एक बयान में कहा।
"इस कार्रवाई के साथ, श्री प्रेमजी द्वारा योगदान किए गए परोपकारी एंडॉवमेंट कॉर्पस का कुल मूल्य $ 21 बिलियन है, जिसमें विप्रो के आर्थिक स्वामित्व का 67% शामिल है।"
उनकी नींव शिक्षा में सीधे काम करती है और बहु-वर्षीय वित्तीय अनुदान के माध्यम से कम-विशेषाधिकार प्राप्त और हाशिए पर रहने वाले 150 से अधिक गैर-लाभकारी संगठनों का समर्थन करती है। फाउंडेशन ने शिक्षा और संबंधित मानव विकास डोमेन में पेशेवरों को विकसित करने, डिग्री और शिक्षा कार्यक्रमों की पेशकश करने और अनुसंधान का संचालन करने के लिए अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्थापना की।
बयान में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में यह आधार काफी महत्वपूर्ण हो जाएगा। शिक्षा में काम करने वाली टीम मौजूदा 1,600 लोगों से बढ़ेगी और अनुदान देने वाली गतिविधियाँ तिगुनी हो जाएँगी। बेंगलुरु स्थित विश्वविद्यालय 400 से अधिक संकाय सदस्यों के साथ 5,000 छात्रों का विस्तार करेगा। यह फाउंडेशन उत्तर भारत में एक और विश्वविद्यालय स्थापित करने का इरादा रखता है।
अल्ट्रा-अमीर भारतीय, जिनकी कुल संपत्ति $ 50 मिलियन से अधिक है, वे पांच साल पहले की तुलना में कम धर्मार्थ हैं, मिंट अखबार ने पिछले हफ्ते रिपोर्ट की थी, जिसमें प्रेमजी अपवाद थे। बेंगलुरु के 73 वर्षीय अरबपति भारत के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति हैं और ब्लूमबर्ग की वैश्विक अरबपतियों की सूची में 51 वें स्थान पर हैं।

Sunday, March 10, 2019

आदर्श आचार संहिता' लागू, जानिए इसके बारे में सब कुछ

लोकसभा चुनावों के एलान के साथ ही 'आदर्श आचार संहिता' लागू, जानिए इसके बारे में सब कुछ*👇

लोकसभा चुनाव का एलान हो चुका है। और इसी के साथ लागू हो गई है आदर्श आचार संहिता। इस चुनावी माहौल में आपके लिए जरूरी है कि आप चुनाव के तमाम नियमों से अपडेट रहें। भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत पारदर्शी चुनावों के सफल आयोजन की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होती है। इसलिए चुनाव आयोग 'चुनाव आचार संहिता' लागू करता है जिसका पालन चुनाव खत्म होने तक हर पार्टी और उसके उम्मीदवार को करना होता है।

*चुनाव आचार संहिता : क्या, क्यों और कैसे?*

देश में होने वाले सभी चुनावों से पहले चुनाव आयोग आचार संहिता (Code of Conduct) लगाता है। इस दौरान राजनीतिक दलों, उनके उम्मीदवारों और आम जनता को सख्त नियमों का पालन करना होता है। अगर कोई उम्मीदवार इन नियमों का पालन नहीं करता तो चुनाव आयोग उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। उसे चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है और  उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की जा सकती है।

*सामान्य नियम:*

* कोई भी दल ऐसा काम न करे, जिससे जातियों और धार्मिक या भाषाई समुदायों के बीच मतभेद बढ़े या घृणा फैले।
* राजनीतिक दलों की आलोचना कार्यक्रम व नीतियों तक सीमित हो, न कि व्यक्तिगत।
* धार्मिक स्थानों का उपयोग चुनाव प्रचार के मंच के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
* मत पाने के लिए भ्रष्ट आचरण का उपयोग न करें। जैसे-रिश्वत देना, मतदाताओं को परेशान करना आदि।
* किसी की अनुमति के बिना उसकी दीवार, अहाते या भूमि का उपयोग न करें।
* किसी दल की सभा या जुलूस में बाधा न डालें।
* राजनीतिक दल ऐसी कोई भी अपील जारी नहीं करेंगे, जिससे किसी की धार्मिक या जातीय भावनाएं आहत होती हों।

*राजनीतिक सभाओं से जुड़े नियम :*

* सभा के स्थान व समय की पूर्व सूचना पुलिस अधिकारियों को दी जाए।
* दल या अभ्यर्थी पहले ही सुनिश्चित कर लें कि जो स्थान उन्होंने चुना है, वहॉं निषेधाज्ञा तो लागू नहीं है।
* सभा स्थल में लाउडस्पीकर के उपयोग की अनुमति पहले प्राप्त करें।
* सभा के आयोजक विघ्न डालने वालों से निपटने के लिए पुलिस की सहायता करें।



*कुछ और नियम*

*जुलूस संबंधी नियम :*

* जुलूस का समय, शुरू होने का स्थान, मार्ग और समाप्ति का समय तय कर सूचना पुलिस को दें।
* जुलूस का इंतजाम ऐसा हो, जिससे यातायात प्रभावित न हो।
* राजनीतिक दलों का एक ही दिन, एक ही रास्ते से जुलूस निकालने का प्रस्ताव हो तो समय को लेकर पहले बात कर लें।
* जुलूस सड़क के दायीं ओर से निकाला जाए।
* जुलूस में ऐसी चीजों का प्रयोग न करें, जिनका दुरुपयोग उत्तेजना के क्षणों में हो सके।

*मतदान के दिन संबंधी नियम :*

* अधिकृत कार्यकर्ताओं को बिल्ले या पहचान पत्र दें।
* मतदाताओं को दी जाने वाली पर्ची सादे कागज पर हो और उसमें प्रतीक चिह्न, अभ्यर्थी या दल का नाम न हो।
* मतदान के दिन और इसके 24 घंटे पहले किसी को शराब वितरित न की जाए।
* मतदान केन्द्र के पास लगाए जाने वाले कैम्पों में भीड़ न लगाएं।
* कैम्प साधारण होने चाहिए।
* मतदान के दिन वाहन चलाने पर उसका परमिट प्राप्त करें।

*सत्ताधारी दल के लिए नियम :*

* कार्यकलापों में शिकायत का मौका न दें।
* मंत्री शासकीय दौरों के दौरान चुनाव प्रचार के कार्य न करें।
* इस काम में शासकीय मशीनरी तथा कर्मचारियों का इस्तेमाल न करें।
* सरकारी विमान और गाड़ियों का प्रयोग दल के हितों को बढ़ावा देने के लिए न हो।
* हेलीपेड पर एकाधिकार न जताएं।

Sunday, March 3, 2019

बारह महाजन

स्वयम्भुर्नारद:शम्भु कुमार: कपिलोमनु: 

प्रह्लादोजनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम। 

ये12 महाजन हैं-स्वयंभू, शंभु, नारद, सनत कुमार, कपिल, मनु, जनक, भीष्म, बली, व्यास जी, प्रह्लाद और यमराज। 

Thursday, January 24, 2019

गरुड़ पुराण में वर्णित नरक

गरुड़ पुराण में वर्णन है 36 नर्क का, जानिए किसमें कैसे दी जाती है सजा
हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखी अनेक कथाओं में स्वर्ग और नर्क के बारे में बताया गया है। पुराणों के अनुसार स्वर्ग वह स्थान होता है जहां देवता रहते हैं और अच्छे कर्म करने वाले इंसान की आत्मा को भी वहां स्थान मिलता है, इसके विपरीत बुरे काम करने वाले लोगों को नर्क भेजा जाता है, जहां उन्हें सजा के तौर पर गर्म तेल में तला जाता है और अंगारों पर सुलाया जाता है।
यह भी पढ़े- गरुड़ पुराण- इन 5 कामों से कम होती है उम्र
हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण, कठोपनिषद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। आज हम आपको उन नर्कों के बारे में संक्षिप्त रूप से बता रहे हैं-
1. महावीचि- यह नर्क पूरी तरह रक्त यानी खून से भरा है और इसमें लोहे के बड़े-बड़े कांटे हैं। जो लोग गाय की हत्या करते हैं, उन्हें इस नर्क में यातना भुगतनी पड़ती है।
2. कुंभीपाक- इस नर्क की जमीन गरम बालू और अंगारों से भरी है। जो लोग किसी की भूमि हड़पते हैं या ब्राह्मण की हत्या करते हैं। उन्हें इस नर्क में आना पड़ता है।
3. रौरव- यहां लोहे के जलते हुए तीर होते हैं। जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इन तीरों से बींधा जाता है।
4. मंजूष- यह जलते हुए लोहे जैसी धरती वाला नर्क है। यहां उनको सजा मिलती है, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं या कैद में रखते हैं।
5. अप्रतिष्ठ- यह पीब, मूत्र और उल्टी से भरा नर्क है। यहां वे लोग यातना पाते हैं, जो ब्राह्मणों को पीड़ा देते हैं या सताते हैं।
6. विलेपक- यह लाख की आग से जलने वाला नर्क है। यहां उन ब्राह्मणों को जलाया जाता है, जो शराब पीते हैं।
7. महाप्रभ- इस नर्क में एक बहुत बड़ा लोहे का नुकीला तीर है। जो लोग पति-पत्नी में फूट डालते हैं, पति-पत्नी के रिश्ते तुड़वाते हैं वे यहां इस तीर में पिरोए जाते हैं।
8. जयंती- यहां जीवात्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। जो लोग पराई औरतों के साथ संभोग करते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
9. शाल्मलि- यह जलते हुए कांटों से भरा नर्क है। जो औरत कई पुरुषों से संभोग करती है व जो व्यक्ति हमेशा झूठ व कड़वा बोलता है, दूसरों के धन और स्त्री पर नजर डालता है। पुत्रवधू, पुत्री, बहन आदि से शारीरिक संबंध बनाता है व वृद्ध की हत्या करता है, ऐसे लोगों को यहां लाया जाता है।
10. महारौरव- इस नर्क में चारों तरफ आग ही आग होती है। जैसे किसी भट्टी में होती है। जो लोग दूसरों के घर, खेत, खलिहान या गोदाम में आग लगाते हैं, उन्हें यहां जलाया जाता है।
11. तामिस्र- इस नर्क में लोहे की पट्टियों और मुग्दरों से पिटाई की जाती है। यहां चोरों को यातना मिलती है।
12. महातामिस्र- इस नर्क में जौंके भरी हुई हैं, जो इंसान का रक्त चूसती हैं। माता, पिता और मित्र की हत्या करने वाले को इस नर्क में जाना पड़ता है।
13. असिपत्रवन- यह नर्क एक जंगल की तरह है, जिसके पेड़ों पर पत्तों की जगह तीखी तलवारें और खड्ग हैं। मित्रों से दगा करने वाला इंसान इस नर्क में गिराया जाता है।
14. करम्भ बालुका- यह नर्क एक कुएं की तरह है, जिसमें गर्म बालू रेत और अंगारे भरे हुए हैं। जो लोग दूसरे जीवों को जलाते हैं, वे इस कुएं में गिराए जाते हैं।
15. काकोल- यह पीब और कीड़ों से भरा नर्क है। जो लोग छुप-छुप कर अकेले ही मिठाई खाते हैं, दूसरों को नहीं देते, वे इस नर्क में लाए जाते हैं।
16. कुड्मल- यह मूत्र, पीब और विष्ठा (उल्टी) से भरा है। जो लोग दैनिक जीवन में पंचयज्ञों ( ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) का अनुष्ठान नहीं करते वे इस नर्क में आते हैं।
17. महाभीम- यह नर्क बदबूदार मांस और रक्त से भरा है। जो लोग ऐसी चीजें खाते हैं, जिनका शास्त्रों ने निषेध बताया है, वो लोग इस नर्क में गिरते हैं।
18. महावट- इस नर्क में मुर्दे और कीड़े भरे हैं, जो लोग अपनी लड़कियों को बेचते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
19. तिलपाक- यहां दूसरों को सताने, पीड़ा देने वाले लोगों को तिल की तरह पेरा जाता है। जैसे तिल का तेल निकाला जाता है, ठीक उसी तरह।
20. तैलपाक- इस नर्क में खौलता हुआ तेल भरा है। जो लोग मित्रों या शरणागतों की हत्या करते हैं, वे यहां इस तेल में तले जाते हैं।
21. वज्रकपाट- यहां वज्रों की पूरी श्रंखला बनी है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते हैं, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं।
22. निरुच्छवास- इस नर्क में अंधेरा है, यहां वायु नहीं होती। जो लोग दिए जा रहे दान में विघ्न डालते हैं वे यहां फेंके जाते हैं।
23. अंगारोपच्य- यह नर्क अंगारों से भरा है। जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं। वे यहां जलाए जाते हैं।
24. महापायी- यह नर्क हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य बोलने वाले यहां औंधे मुंह गिराए जाते हैं।
25. महाज्वाल- इस नर्क में हर तरफ आग है। जो लोग हमेशा ही पाप में लगे रहते हैं वे इसमें जलाए जाते हैं।
26. गुड़पाक- यहां चारों ओर गरम गुड़ के कुंड हैं। जो लोग समाज में वर्ण संकरता फैलाते हैं, वे इस गुड़ में पकाए जाते हैं।
27. क्रकच- इस नर्क में तीखे आरे लगे हैं। जो लोग ऐसी महिलाओं से संभोग करते हैं, जिसके लिए शास्त्रों ने निषेध किया है, वे लोग इन्हीं आरों से चीरे जाते हैं।
28. क्षुरधार- यह नर्क तीखे उस्तरों से भरा है। ब्राह्मणों की भूमि हड़पने वाले यहां काटे जाते हैं।
29. अम्बरीष- यहां प्रलय अग्रि के समान आग जलती है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।
30. वज्रकुठार- यह नर्क वज्रों से भरा है। जो लोग पेड़ काटते हैं वे यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।
31. परिताप- यह नर्क भी आग से जल रहा है। जो लोग दूसरों को जहर देते हैं या मधु (शहद) की चोरी करते हैं, वे यहां जलाए जाते हैं।
32. काल सूत्र- यह वज्र के समान सूत से बना है। जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं। वे यहां सजा पाते हैं।
33. कश्मल- यह नर्क नाक और मुंह की गंदगी से भरा होता है। जो लोग मांसाहार में ज्यादा रुचि रखते हैं, वे यहां गिराए जाते हैं।
34. उग्रगंध- यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नर्क है। जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते, वे यहां लाए जाते हैं।
35. दुर्धर- यह नर्क जौक और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नर्क में भेजे जाते हैं।
36. वज्रमहापीड- यहां लोहे के भारी वज्र से मारा जाता है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, किसी प्राणी की हत्या कर उसे खाते हैं, दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्र चुराते हैं, जो दूसरों के फल चुराते हैं, धर्म को नहीं मानते ऐसे सारे लोग यहां लाए जाते हैं।
नमः शिवाय

Wednesday, January 23, 2019

माघ स्नान की महिमा

.                       "माघ स्नान माहात्म्य"


          'पद्म पुराण' के उत्तर खण्ड में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि व्रत, दान व तपस्या से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में ब्राह्ममुहूर्त में उठकर स्नानमात्र से होती है।

               व्रतैर्दानस्तपोभिश्च  न  तथा  प्रीयते  हरिः।
               माघमज्जनमात्रेण यथा प्रीणाति केशवः।।

          अतः सभी पापों से मुक्ति व भगवान की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान व्रत करना चाहिए। इसका प्रारम्भ पौष की पूर्णिमा से होता है।
          माघ मास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहाँ कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है। इस मास की प्रत्येक तिथि पर्व हैं। कदाचित् अशक्तावस्था में पूरे मास का नियम न ले सकें तो शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था की है तीन दिन अथवा एक दिन अवश्य माघ-स्नान व्रत का पालन करें। इस मास में स्नान, दान, उपवास और भगवत्पूजा अत्यन्त फलदायी है।
          माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'षटतिला एकादशी' के नाम से जानी जाती है। इस दिन काले तिल तथा काली गाय के दान का भी बड़ा माहात्म्य है।
1. तिल मिश्रित जल से स्नान, 2. तिल का उबटन, 3. तिल से हवन, 4. तिलमिश्रित जल का पान व तर्पण, 5. तिलमिश्रित भोजन, 6. तिल का दान। ये छः कर्म पाप का नाश करने वाले हैं।
          माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या 'मौनी अमावस्या' के रूप में प्रसिद्ध है। इस पवित्र तिथि पर मौन रहकर अथवा मुनियों के समान आचरणपूर्वक स्नान दान करने का विशेष महत्त्व है।
          अमावस्या के दिन (04 फरवरी) सोमवार का योग होने पर उस दिन देवताओं को भी दुर्लभ हो ऐसा पुण्यकाल होता है, क्योंकि गंगा, पुष्कर एवं दिव्य अंतरिक्ष और भूमि के जो सब तीर्थ हैं, वे 'सोमवती (दर्श) अमावस्या' के दिन के जप, ध्यान, पूजन करने पर विशेष धर्मलाभ प्रदान करते हैं।
          मंगलवारी चतुर्थी, रविवारी सप्तमी, बुधवारी अष्टमी, सोमवारी अमावस्या, ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं। इनमें किया गया स्नान, दान व श्राद्ध अक्षय होता है।
          माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् 'वसंत पंचमी' को माँ सरस्वती का आविर्भाव-दिवस माना जाता है। इस दिन (10 फरवरी) प्रातः सरस्वती-पूजन करना चाहिए। पुस्तक और लेखनी (कलम) में भी देवी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है, अतः उनकी भी पूजा की जाती है।
          शुक्ल पक्ष की सप्तमी को 'अचला सप्तमी' कहते हैं। षष्ठी के दिन एक बार भोजन करके सप्तमी (12 फऱवरी) को सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से पापनाश, रूप, सुख-सौभाग्य और सदगति प्राप्त होती है।
          ऐसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है, तथापि उनमें भी माघी पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। इस दिन (19 फरवरी) स्नानादि से निवृत्त होकर भगवत्पूजन, श्राद्ध तथा दान करने का विशेष फल है। जो इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर भगवान विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है।
          माघी पूर्णिमा के दिन तिल, सूती कपड़े, कम्बल, रत्न, पगड़ी, जूते आदि का अपने वैभव के अनुसार दान करके मनुष्य स्वर्गलोक में सुखी होता है। 'मत्स्य पुराण' के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है

Sunday, January 20, 2019

माँ

मां एक ऐसा शब्द जो कि अपने आप में परिपूर्ण शब्द है |मां हमारे अस्तित्व का मूल कारण है |मां हमारी पैदाइश में भगवान की साझेदार है |हमने भगवान को नही देखा है न ही छुआ है परंतु अगर भगवान मिलते तो शायद मां के जैसा ही व्यवहार करते|जब एक बच्चा पैदा होता है तो वह रोने के अलावा कुछ नहीं जानता|मां उसे धीरे धीरे हर चीज़ सिखाती है |जब एक मां गर्भ धारण करती है तो वह केवल नये प्राणी को अस्तित्व में लाने का प्रयास ही नहीं करती अपितु वह अपने शरीर  का भी बलिदान करती है |गर्भ में बच्चा मां से रक्त, मांस, विचार और व्यवहार लेता है |जब कोई स्त्री गर्भवती होती है तो उसे अनेक प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं जो कि दुनियां का कोई भी पुरुष नही सह सकता |फिर भी मां हसते हसते सब सहकर नये प्राणी को अस्तित्व में लाती है |संसार में जितने भी जीव हैं सब किसी न किसी मां की कोख से ही जन्म प्राप्त करते हैं |बिना मां के किसी का जन्म संभव ही नहीं है |जब एक जीव जन्म लेताहै तो उसे रोने के सिवा कुछ भी नहीं आता है |मां अपने नवजात शिशु की हर आवश्यकता का खयाल रखती है |बच्चा बोल नहीं पाता कि उसे क्या चाहिये पर मां समझ जाती है |बच्चे की भूख, प्यास, तकलीफ सब मां तुरंत समझ जाती है |बच्चा कब क्या चाहता है यह बात केवल मां समझती है |जो वात्सल्य हमें मां की गोंद में मिलता है धरती पर कहीं नही मिल सकता |हमारे धर्मग्रंथों में भी मां के महत्व को सर्वोपरि बताया गया है |हमारे धर्मग्रंथ बताते हैं कि मां प्रथम गुरू है, मां भगवान है, मां की सेवा से सम्पूर्ण देवी देवता की सेवा का फल प्राप्त हो जाता है |
दुनिया में कोई आपकी मुस्कान के लिए अपनी कुर्बानी दे सकता है तो वह केवल मां है |
दुनियां केवल मां ही है जो आपके हर अपराध को क्षमा कर देती है |
दुनिया में मां ही है जो तुम्हारी खुशी के लिए अपनी जिंदगी तक की कुर्बानी हंसकर दे देती है |
आजकल विशेषरूप से शहरों में वृद्धाश्रम की भरमार हो गयी है | वृद्धाश्रम हमारी सभ्यता पर कलंक है |जिससे हमें रूप रंग तन मन धन जीवन आचार विचार व्यवहार स्वभाव प्रभाव मिला हमारे घरों में उनकी ही जगह न रही|जिस मां ठंड गरम की परवाह किये बिना तुम्हें दुलारों से पाला उसके तुम वृद्धाश्रम छोड़ आये |मां को त्यागने वालों उसके दूध से जो तुम्हारा पोषण हुआ उसे कैसे त्याग सकते हो |जिसने तुम्हें पलकों पर रखा तुम उसे वृद्धाश्रम में रखते हो|
जिसने अपनी माँ के चरणों में प्रणाम कर लिया उसे किसी मंदिर में जाने की जरूरत नहीं है |मां की गोद का सुख लेने के लिए हमारा भगवान गोकुल में पैदा होता है |दुनियां में मां की गोंद से पवित्र कोई जगह नहीं है |धरती पर मां के चरणों से पूजनीय दूसरी जगह नहीं है |मां के हाथों के कोमल स्पर्श से बढकर कोई सुख नहीं है |मां की सिखाई बातों से बढकर कोई शिक्षा नहीं है |
मां से बढकर कोई गुरू नहीं है |मां इतना कुछ हमे देती है और बदले में कुछ भी नहीं चाहती | जिसकी दुआ केवल हमारे लिए होती है |
कैसी विडम्बना है कि लोग लड़की के प्यार में पागल होकर आत्महत्या कर लेते हैं परंतु मां के लिए जरा सा कष्ट नहीं उठा सकते|बड़े भाग्यवान हैं वो लोग जिन्हें मां मिली मां का प्यार मिला |वे सभी लोग जिनकी मां है अपनी माँ को सम्मान दें प्यार दे भगवान उनका विशेष खयाल रखेगा |
जय हिंद जय भारत जय श्री राम |

Wednesday, January 16, 2019

पारिजात वृक्ष

!!! पारिजात वृक्ष : इस वृक्ष के कारण हुआ था इंद्र और कृष्ण में युद्ध !!!

पारिजात वृक्ष तो पुरे भारत में पाये जाते है, लेकिन किंटूर में पाया जाने वाला यह पारिजात वृक्ष अपने आप कई विशेषताए रखता है और यह अपनी तरह का पुरे भारत में इकलौता पारिजात वृक्ष है।

उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिला मुख्यालय से ३८ किलोमीटर कि दूरी पर किंटूर गाँव है।

इस जगह का नामकरण पाण्डवों कि माता कुन्ती के नाम पर हुआ है। यहाँ पर पाण्डवों ने माता कुन्ती के साथ अपना अज्ञातवास बिताया था।

इसी किंटूर गाँव में भारत का एक मात्र पारिजात का पेड़ पाया जाता है। कहते है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से सारी थकान मिट जाती है |

*** पारिजात वृक्ष के बारे में -

आमतौर पर पारिजात वृक्ष १० फीट  से २५ फीट तक ऊंचे होता है, पर किंटूर में स्तिथ पारिजात वृक्ष लगभग ४५ फीट ऊंचा और ५० फीट मोटा है।

इस पारिजात वृक्ष कि सबसे बड़ी विशेषता यह है कि, यह अपनी तरह का  इकलौता पारिजात वृक्ष है, क्योंकि इस पारिजात वृक्ष पर बीज नहीं लगते है तथा इस पारिजात वृक्ष कि कलम बोने से भी दूसरा वृक्ष तैयार नहीं होता है।

पारिजात वृक्ष  पर जून के आस पास बेहद खूबसूरत सफ़ेद रंग के फूल खिलते है। पारिजात के फूल केवल रात कि खिलते है और सुबह होते ही मुरझा जाते है। 

इन फूलों का लक्ष्मी पूजन में विशेष महत्तव है। पर एक बात ध्यान रहे कि पारिजात वृक्ष के वे ही फूल पूजा में काम लिए जाते है जो वृक्ष से टूट कर गिर जाते है, वृक्ष से फूल तोड़ने कि मनाही है।

पारिजात वृक्ष का वर्णन हरिवंश पुराण में भी आता है। हरिवंश पुराण में इसे कल्पवृक्ष कहा गया है जिसकी उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी और जिसे इंद्र ने स्वर्गलोक में स्थपित कर दिया था।

हरिवंश पुराण के अनुसार इसको छूने मात्र से ही देव नर्त्तकी उर्वशी कि थकान मिट जाती थी।

*** पारिजात वृक्ष के किंटूर पहुंचने की कहानी !!!

एक बार देवऋषि नारद जब धरती पर कृष्ण से मिलने आये तो अपने साथ पारिजात के सुन्दर पुष्प ले कर आये।  उन्होंने वे पुष्प श्री कृष्ण को भेट किये।

श्री कृष्ण ने पुष्प साथ बैठी अपनी पत्नी रुक्मणि को दे दिए।

लेकिन जब श्री कृष्ण कि दूसरी पत्नी सत्य भामा को पता चला कि स्वर्ग से आये पारिजात के सारे पुष्प श्री कृष्ण ने रुक्मणि को दे दिए तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने श्री कृष्ण के सामने जिद पकड़ ली कि, उन्हें अपनी वाटिका के लिय  पारिजात वृक्ष चाहिए। 

श्री कृष्ण के लाख समझाने पर भी सत्य भामा नहीं मानी।

सत्यभामा कि ज़िद के आगे झुकते हुए श्री कृष्ण ने अपने दूत को स्वर्ग पारिजात वृक्ष लाने के लिए भेजा पर इंद्र ने पारिजात वृक्ष देने से मना कर दिया। 

दूत ने जब यह बात आकर श्री कृष्ण को बताई तो उन्होंने स्व्यं ही इंद्र पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को पराजित करके पारिजात वृक्ष को जीत लिया।

इससे रुष्ट होकर इंद्र ने पारिजात वृक्ष को फल से वंचित हो जाने का श्राप दे दिया और तभी से पारिजात वृक्ष फल विहीन हो गया।

श्री कृष्ण ने पारिजात वृक्ष को ला कर सत्यभामा कि वाटिका में रोपित कर दिया, पर सत्यभामा को सबक सिखाने के लिया ऐसा कर दिया कि, जब पारिजात वृक्ष पर पुष्प आते तो गिरते वो रुक्मणि कि वाटिका में। 

और यही कारण है कि, पारिजात के पुष्प वृक्ष के नीचे न गिरकर वृक्ष से दूर गिरते है। इस तरह पारिजात वृक्ष , स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गया।

*** महाभारत काल से किंटूर के पारिजात वृक्ष का संबंध !!!

इसके बाद जब पाण्डवों ने किंटूर में अज्ञातवास किया तो उन्होंने वहाँ माता कुन्ती के लिए भगवन शिव के एक मंदिर कि स्थापना कि जो कि, अब कुन्तेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। 

कहते है कि, माता कुन्ती पारिजात के पुष्पों से भगवान् शंकर कि पूजा अर्चना कर सके इसलिए पांडवों ने सत्यभामा कि वाटिका से पारिजात वृक्ष को लाकर यहाँ स्थापित कर दिया और तभी से पारिजात वृक्ष यहाँ पर है।

*** अन्य किवंदतियां भी है पारिजात वृक्ष के बारे में !!!

एक अन्य मान्यता यह भी है कि, पारिजात नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी, जिसे भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था।

लेकिन अथाग प्रयास करने पर भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्रेम कों स्वीकार नहीं किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने आत्महत्या कर ली।

जिस स्थान पर पारिजात की क़ब्र बनी, वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया।

*** सरकार द्वारा पारिजात वृक्ष पर जारी डाक टिकट !!!

पारिजात वृक्ष के ऐतिहासिक महत्तव व इसकी दुर्लभता को देखते हुए सरकार ने इसे संरक्षित घोषित कर दिया है। भारत सरकार ने इस पर एक डाक टिकट भी जारी किया है।

*** औषधीय गुणों से भी भरपूर है पारिजात वृक्ष !!!

पारिजात को आयुर्वेद में हरसिंगार भी कहा जाता है। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलों के रस का सेवन किया जाए तो हृदय रोग से बचा जा सकता है।

इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खाँसी ठीक हो जाती है।

इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते हैं।

पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोंपल को यदि पाँच काली मिर्च के साथ महिलाएँ सेवन करें तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है।

वहीं पारिजात के बीज जहाँ बालों के लिए शीरप का काम करते हैं तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर दे|

Insurance is not investment

  Insurance is not investment. Insurance and investments are two different financial instruments that serve different purposes. Insurance ...