Thursday, March 9, 2023

Insurance is not investment

 Insurance is not investment.


Insurance and investments are two different financial instruments that serve different purposes. Insurance is primarily designed to provide protection against unforeseen risks, while investments are aimed at growing wealth over time. Despite this distinction, many people tend to confuse insurance with investment, which can lead to misunderstanding and poor financial decisions. In this essay, we will explore why insurance is not an investment.

Firstly, insurance is designed to protect against unexpected events, such as accidents, illness, or natural disasters. Insurance policies provide financial compensation in the event of a loss, which can help individuals and families to recover from unexpected events without suffering a significant financial impact. For example, life insurance provides financial support to the dependents of a deceased person, while health insurance covers medical expenses incurred due to illness or injury.

On the other hand, investments are aimed at growing wealth over time. Investments involve putting money into various financial assets, such as stocks, bonds, and mutual funds, with the expectation of earning a return on investment. Unlike insurance, investments are not designed to provide protection against unexpected events. Instead, investments are intended to generate wealth over time by earning returns that exceed the rate of inflation.

Secondly, insurance typically involves paying a premium to an insurance company in exchange for coverage. The amount of the premium is determined based on the level of risk and the amount of coverage required. In contrast, investments require an initial investment of capital, which is then invested in various financial assets to generate a return.

Unlike investments, insurance premiums do not generate any returns or profits. The primary purpose of the premium is to transfer the risk from the policyholder to the insurance company. In other words, insurance premiums are a form of risk management, not a form of investment.

Thirdly, insurance policies often come with restrictions and limitations that make them unsuitable as investment vehicles. For example, life insurance policies may come with strict terms and conditions, such as restrictions on the age of the policyholder or the length of the policy term. Health insurance policies may also come with limitations on the types of medical treatments covered or the maximum amount of coverage available.

In contrast, investment vehicles such as stocks, bonds, and mutual funds offer a wide range of options that can be tailored to meet individual investment goals and risk tolerance levels. Investors can choose from a variety of assets with different levels of risk and return potential, allowing them to create a diversified investment portfolio that suits their specific needs.

Finally, insurance and investments have different tax implications. While insurance premiums are typically not tax-deductible, investments such as Individual Retirement Accounts (IRAs) and 401(k) plans offer tax benefits that can help investors save money on taxes.

In conclusion, insurance is not an investment. While insurance provides protection against unforeseen risks, investments are aimed at growing wealth over time. Insurance premiums are a form of risk management, not a form of investment. Investments offer a wide range of options that can be tailored to meet individual investment goals and risk tolerance levels. Therefore, it is important to understand the differences between insurance and investments and to make informed financial decisions based on individual needs and goals.

Sunday, September 20, 2020

तुम हो कितनी हसीं

 तुम हो कीतनी हसीं ए बता दूं तुम्हें।

एक दिन आओ तुझसे मिलादूं तुम्हें।

डूबकर मैंने तुझमें है तुमको लिखा

हो इजाजत तो सबकुछ सुना दूं तुम्हें।।

                       -अवनीश द्विवेदी

चरणामृत का महत्व

क्या है चरणामृत का महत्व!!!!!!!

अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है,क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की कि चरणामृतका क्या महत्व है, शास्त्रों में कहा गया है।

*अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।*
*विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।*

*"अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधि के समान है।*

*जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता" जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है।

चरणामृत से सम्बन्धित एक पौराणिक गाथा काफी प्रसिद्ध है जो हमें श्रीकृष्ण एवं राधाजी के अटूट प्रेम की याद दिलाती है। कहते हैं कि एक बार नंदलाल काफी बीमार पड़ गए। कोई दवा या जड़ी-बूटी उन पर बेअसर साबित हो रही थी। तभी श्रीकृष्ण ने स्वयं ही गोपियों से एक ऐसा उपाय करने को कहा जिसे सुन गोपियां दुविधा में पड़ गईं।

श्रीकृष्ण हुए बीमार
दरअसल श्रीकृष्ण ने गोपियों से उन्हें चरणामृत पिलाने को कहा। उनका मानना था कि उनके परम भक्त या फिर जो उनसे अति प्रेम करता है तथा उनकी चिंता करता है यदि उसके पांव को धोने के लिए इस्तेमाल हुए जल को वे ग्रहण कर लें तो वे निश्चित ही ठीक हो जाएंगे। दूसरी ओर गोपियां और भी चिंता में पड़ गईं। श्रीकृष्ण उन सभी गोपियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे, वे सभी उनकी परम भक्त थीं, लेकिन उन्हें इस उपाय के निष्फल होने की चिंता सता रही थी।

उनके मन में बार-बार यह आ रहा था कि यदि उनमें से किसी एक गोपी ने अपने पांव के इस्तेमाल से चरणामृत बना लिया और कृष्णजी को पीने के लिए दिया तो वह परम भक्त का कार्य तो कर देगी। परन्तु किन्हीं कारणों से कान्हा ठीक ना हुए तो उसे नर्क भोगना पड़ेगा।

अब सभी गोपियां व्याकुल होकर श्रीकृष्ण की ओर ताक रहीं थी और किसी अन्य उपाय के बारे में सोच ही रहीं थी कि वहां कृष्ण की प्रिय राधा आ गईं। अपने कृष्ण को इस हालत में देख के राधा के तो जैसे प्राण ही निकल गए हों।जब गोपियों ने कृष्ण द्वारा बताया गया उपाय राधा को बताया तो राधा ने एक क्षण भी व्यर्थ करना उचित ना समझा और जल्द ही स्वयं के पांव धोकर चरणामृत तैयार कर श्रीकृष्ण को पिलाने के लिए आगे बढ़ी।

 राधा जानतीं थी कि वे क्या कर रही हैं। जो बात अन्य गोपियों के लिए भय का कारण थी ठीक वही भय राधा को भी मन में था लेकिन कृष्ण को वापस स्वस्थ करने के लिए वह नर्क में चले जाने को भी तैयार थीं।आखिरकार कान्हा ने चरणामृत ग्रहण किया और देखते ही देखते वे ठीक हो गए, क्योंकि वह राधा ही थीं जिनके प्यार एवं सच्ची निष्ठा से कृष्णजी तुरंत स्वस्थ हो गए।  अपने कृष्ण को निरोग देखने के लिए राधाजी ने एक बार भी स्वयं के भविष्य की चिंता ना की और वही किया जो उनका धर्म था।

इतिहास गवाह है इस बात का...
राधा-कृष्ण का कभी विवाह ना हुआ, लेकिन उनका प्यार इतना पवित्र एवं सच्चा था कि आज भी दोनों का नाम एक साथ लेने में भक्त एक क्षण भी संदेह महसूस नहीं करते। उनके भक्तों के लिए कृष्ण केवल राधा के हैं तथा राधा भी कृष्ण की ही हैं।

राधा-कृष्ण की इस कहानी ने चरणामृत को एक ऐतिहासिक पहलू तो दिया ही, लेकिन आज भी चरणामृत को प्रभु का प्रसाद मानकर भक्तों में बांटा जाता है। पीतल के बर्तन में पीतल के ही चम्मच से, थोड़ा मीठा-सा यह अमृत भक्तों के कंठ को पवित्र बनाता है।*

*जब भगवान का वामन अवतार हुआ, और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए और दूसरे में ऊपर के लोक नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में से जल लेकर भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत को वापस अपने कमंडल में रख लिया,वह चरणामृत गंगा जी बन गई, जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है, ये शक्ति उनके पास कहाँ से पात्र शक्ति है भगवान के चरणों की जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी।

*जब हम बाँके बिहारी जी की आरती गाते है तो कहते है - "चरणों से निकली गंगा प्यारी जिसने सारी दुनिया तारी"*

*धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है। चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।

कहते हैं भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया, बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।

चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं, चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।

आयुर्वेदिक मतानुसार, तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।

इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है। तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए । ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि,स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।

इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधि के समान है। यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है। कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ का या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है।

इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये, लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं। चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं?*

*दरअसल शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है।कहते हैं इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं, बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है। इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।

कृपया इस जानकारी को मित्रगण एवं अपने निकटतम परिजनों और परिवार से साझा व वार्तालाप या परामर्श करें।
मानस अमृत

Thursday, December 12, 2019

असमंजस

असमंजस की प्रबल भंवर से जैसे तैसे निकलना है।
जिससे कुछ भी कहना मुश्किल उससे सबकुछ कहना है।
धक-धक दिल करता है पैरों में कंपन भारी है
लब खुलेंगे कैसे उसके आगे बस इसकी तैयारी है।

Wednesday, December 4, 2019

गुलाब देखा

गुलाबी साइकिल पर बैठा हुआ गुलाब देखा।
लगा ऐसा कि जैसे कोई ख़्वाब देखा।
काट ली खुद च्यूटियां यकीं आया तब
वाकई इन आंखों ने कुछ लाजवाब देखा।।

Tuesday, August 27, 2019

राजा मोरध्वज की कथा

राजा  मोरध्वज की कथा,,,,

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद अर्जुन को वहम हो गया की वो श्रीकृष्ण के सर्वश्रेष्ठ भक्त है, अर्जुन सोचते की कन्हैया ने मेरा रथ चलाया, मेरे साथ रहे इसलिए में भगवान का सर्वश्रेष्ठ भक्त हूँ। अर्जुन को क्या पता था की वो केवल भगवान के धर्म की स्थापना का जरिया था। फिर भगवान ने उसका गर्व तोड़ने के लिए उसे एक परीक्षा का गवाह बनाने के लिए अपने साथ ले गए।

श्रीकृष्ण और अर्जुन ने जोगियों का वेश बनाया और वन से एक शेर पकड़ा और पहुँच जाते है भगवान विष्णु के परम-भक्त राजा मोरध्वज के द्वार पर। राजा मोरध्वज बहुत ही दानी और आवभगत वाले थे अपने दर पे आये किसी को भी वो खाली हाथ और बिना भोज के जाने नहीं देते थे।

दो साधु एक सिंह के साथ दर पर आये है ये  जानकर राजा नंगे पांव दौड़के द्वार पर गए और भगवान के तेज से नतमस्तक हो आतिथ्य स्वीकार करने के लिए कहा। भगवान कृष्ण ने मोरध्वज से कहा की हम मेजबानी तब ही स्वीकार करेंगे जब राजा उनकी शर्त मानें, राजा ने जोश से कहा आप जो भी कहेंगे मैं तैयार हूँ।

भगवान कृष्ण ने कहा, हम तो ब्राह्मण है कुछ भी खिला देना पर ये सिंह नरभक्षी है, तुम अगर अपने इकलौते बेटे को अपने हाथों से मारकर इसे खिला सको तो ही हम तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे। भगवान की शर्त सुन मोरध्वज के होश उड़ गए, फिर भी राजा अपना आतिथ्य-धर्म नहीं छोडना चाहता था। उसने भगवान से कहा प्रभु ! मुझे मंजूर है पर एक बार में अपनी पत्नी से पूछ लूँ ।

भगवान से आज्ञा पाकर राजा महल में गया तो राजा का उतरा हुआ मुख देख कर पतिव्रता रानी ने राजा से कारण पूछा। राजा ने जब सारा हाल बताया तो रानी के आँखों से अश्रु बह निकले। फिर भी  वो अभिमान से राजा से बोली की आपकी आन पर मैं अपने सैंकड़ों पुत्र कुर्बान कर सकती हूँ। आप साधुओ को आदरपूर्वक अंदर ले आइये।

अर्जुन ने भगवान से पूछा- माधव ! ये क्या माजरा है ? आप ने ये क्या मांग लिया ? कृष्ण बोले -अर्जुन तुम देखते जाओ और चुप रहो।
राजा तीनो को अंदर ले आये और भोजन की तैयारी शुरू की। भगवान को छप्पन भोग परोसा गया पर अर्जुन के गले से उत्तर नहीं रहा था। राजा ने स्वयं जाकर पुत्र को तैयार किया। पुत्र भी तीन साल का था नाम था रतन कँवर, वो भी मात पिता का भक्त था, उसने भी हँसते हँसते अपने प्राण दे दिए परंतु उफ़ ना की ।

राजा रानी ने अपने हाथो में आरी लेकर पुत्र के दो  टुकड़े किये और सिंह को परोस दिया। भगवान ने भोजन ग्रहण किया पर जब रानी ने पुत्र का आधा शरीर देखा तो वो आंसू रोक न पाई।  भगवान इस बात पर गुस्सा हो गए की लड़के का एक फाड़ कैसे बच गया? भगवान रुष्ट होकर जाने लगे तो राजा रानी रुकने की मिन्नतें करने लगे।

अर्जुन को अहसास हो गया था की भगवान मेरे ही गर्व को तोड़ने के लिए ये सब कर रहे है। वो स्वयं भगवान के पैरों में गिरकर विनती करने लगा और कहने लगा की आप ने मेरे झूठे मान को तोड़ दिया है। राजा रानी के बेटे को उनके ही हाथो से मरवा दिया और अब रूठ के जा रहे हो, ये उचित नही है। प्रभु ! मुझे माफ़ करो और भक्त का कल्याण करो।

तब केशव ने अर्जुन का घमंड टूटा जान रानी से कहा की वो अपने पुत्र को आवाज दे। रानी ने सोचा पुत्र तो मर चुका है, अब इसका क्या मतलब !! पर साधुओं की आज्ञा मानकर उसने पुत्र रतन कंवर को आवाज लगाई।

कुछ ही क्षणों में चमत्कार हो गया । मृत रतन कंवर जिसका शरीर शेर ने खा लिया था, वो हँसते हुए आकर अपनी माँ से लिपट गया। भगवान ने मोरध्वज और रानी को अपने विराट स्वरुप का दर्शन कराया। पूरे दरबार में वासुदेव कृष्ण की जय जय कार गूंजने लगी।

भगवान के दर्शन पाकर अपनी भक्ति सार्थक जान मोरध्वज की ऑंखें भर आई और वो बुरी तरह बिलखने लगे। भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो राजा रानी ने कहा भगवान एक ही वर दो की अपने भक्त की ऐसी कठोर परीक्षा न ले, जैसी आप ने हमारी ली है। तथास्तु कहकर भगवान ने उसको आशीर्वाद दिया और पूरे परिवार को मोक्ष दिया।

                      ।। जय श्री कृष्णा ।।
            🙏🙏 ।।जय श्री राधे राधे जी।।🙏🙏

Friday, August 16, 2019

नित्य पूजन मन्त्र – इनके जपने से जीवन पर्यन्त रहेगी ईश्वर कृपा

नित्य पूजन मन्त्र – इनके जपने से जीवन पर्यन्त रहेगी ईश्वर कृपा??????

हिन्दु धर्म में सभी कष्टों के निवारण एवं ईश्वर प्राप्ति के लिए नित्य पुजा  का मार्ग श्रेष्ट माना गया है। नित्य पूजन और नित्य पूजा मंत्र जपने से श्रद्धा और विश्वास का ही जन्म नही होता है अपितु मन में एकाग्रता और दृढ इच्छाशक्ति का संचार होता है और दृढ संकल्प से हम किसी भी तरह के कार्य को कर पाने में सक्षम हो पाते है।

नियमित उपासना  के लिए पूजा-स्थली की स्थापना आवश्यक है। घर में एक ऐसा स्थान तलाश करना चाहिये जहाँ अपेक्षाकृत एकान्त रहता हो, आवागमन और कोलाहल कम-से-कम हो। ऐसे स्थान पर एक छोटी चौकी को पीत वस्त्र से सुसज्जित कर उस पर काँच से मढ़ा भगवान का सुन्दर चित्र स्थापित करना चाहिये। गायत्री की उपासना सर्वोत्कृष्ट मानी गई है।

 इसलिये उसकी स्थापना की प्रमुखता देनी चाहिये। यदि किसी का दूसरे देवता के लिये आग्रह हों तो उन देवता का चित्र भी रखा जा सकता है। शास्त्रों में गायत्री के बिना अन्य सब साधनाओं का निष्फल होना लिखा है। इसलिये यदि अन्य देवता को इष्ट माना जाय और उसकी प्रतिमा स्थापित की जाय तो भी गायत्री का चित्र प्रत्येक दशा में साथ रहना ही चाहिये।

अच्छा तो यह है कि एक ही इष्ट गायत्री महाशक्ति को माना जाय और एक ही चित्र स्थापित किया जाय। उससे एकनिष्ठा और एकाग्रता का लाभ होता है। यदि अन्य देवताओं की स्थापना का भी आग्रह हो तो उनकी संख्या कम-से-कम रखनी चाहिये।

 जितने देवता स्थापित किये जायेंगे, जितनी प्रतिमाएं बढ़ाई जायेंगी- निष्ठा उसी अनुपात से विभाजित होती जायेगी। इसलिये यथासंभव एक अन्यथा कम-से-कम छवियाँ पूजा स्थली पर प्रतिष्ठापित करनी चाहिये।

पूजा-स्थली के पास उपयुक्त व्यवस्था के साथ पूजा के उपकरण रखने चाहिये। अगरबत्ती, पंच-पात्र, चमची, धूपबत्ती, आरती, जल गिराने की तस्तरी, चंदन, रोली, अक्षत, दीपक, नैवेद्य, घी, दियासलाई आदि उपकरण यथा-स्थान डिब्बों में रखने चाहिये। आसन कुशाओं का उत्तम है। चटाई में काम चल सकता है।

 आवश्यकतानुसार मोटा या गुदगुदा आसन भी रखा जा सकता है। माला चन्दन या तुलसी की उत्तम है। शंख, सीपी मूँगा जैसी जीव शरीरों से बनने वाली मालाएं निषिद्ध हैं। इसी प्रकार किसी पशु का चमड़ा भी आसन के स्थान पर प्रयोग नहीं करना चाहिये

पूजा उपचार के लिये प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। स्थान और पूजा उपकरणों की सफाई नित्य करनी चाहिये। जहाँ तक हो सके नित्यकर्म से शौच, स्नान आदि से निवृत्त होकर ही पूजा पर बैठना चाहिये। रुग्ण या अशक्त होने की दशा में हाथ-पैर, मुँह आदि धोकर भी बैठा जा सकता है।

पूजा का न्यूनतम कार्य तो निर्धारित रखना ही चाहिये। उतना तो पूरा कर ही लिया जाय। यदि प्रातः समय न मिले तो सोने से पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की पूर्ति की जाय। यदि बाहर प्रवास में रहना हो तो मानसिक ध्यान पूजा भी की जा सकती है। ध्यान में नित्य की हर पूजा पद्धति का स्मरण और भाव कर लेने को मानसिक पूजा कहते हैं।

प्रात: कर-दर्शनम,,,,

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम॥

सबसे पहले शरीर, मन और इन्द्रियों को- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की शुद्धि के लिये आत्म-शुद्धि के पंचोपचार करने चाहिये। यही संक्षिप्त ब्रह्म-संध्या है।

(1) बायें हाथ में एक चम्मच जल रख कर दाहिने से ढंका जाय। पवित्रीकरण का मंत्र अथवा गायत्री मंत्र पढ़ कर उस जल को समस्त शरीर पर छिड़का जाय,

(2) तीन बार, तीन चम्मच भर कर, तीन आचमन किये जांय। आचमनों के तीन मंत्र पुस्तकों में हैं, वे याद न हों तो हर आचमन पर गायत्री मंत्र पढ़ा जा सकता है।

(3) चोटी में गाँठ लगाई जाय। अथवा शिखा स्थान को स्पर्श किया जाय। शिखा बंधन का मंत्र याद न हो तो गायत्री मंत्र पढ़ा जाय।

(4) दाहिना नथुना बन्द कर बायें से साँस खींची जाय। भीतर रोकी जाय और बायाँ नथुना बन्द करके दाहिने छेद से साँस बाहर निकाली जाय। यह प्राणायाम है। प्राणायाम का मंत्र याद न हो तो गायत्री मंत्र मन ही मन पढ़ा जाय।

(5) बाईं हथेली पर जल रख कर दाहिने हाथ की पाँचों उंगलियाँ उसमें डुबोई जांय और क्रमशः मुख, नाक, आँख, कान, बाहु, जंघा इन पर बाईं और दाईं और जल का स्पर्श कराया जाता, यह न्यास है। न्यास के मंत्र याद न होने पर भी गायत्री का प्रयोग हो सकता है। यह शरीर मन और प्राण की शुद्धि के लिये किये जाने वाले पाँच प्रयोग हैं। इन्हें करने के बाद ही देव पूजन का कार्य आरंभ होता है।

स्नान मन्त्र,,,,

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥

देव पूजन में सबसे प्रथम धरती-माता का- मातृ-भूमिका, विश्व-वसुन्धरा का पूजन है। जिस धरती पर जिस देश समाज में जन्म लिया है वह प्रथम देव है, इसलिये इष्टदेव की पूजा से भी पहले पृथ्वी पूजन किया जाता है। पृथ्वी पर जल, अक्षत, चंदन, पुष्प रख कर पूजन करना चाहिये। पृथ्वी पूजन के मंत्र याद न हों तो गायत्री मंत्र का उच्चारण कर लेना चाहिये।

पृथ्वी क्षमा प्रार्थना,,,,

समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥

इसके बाद इष्टदेव का पूजन किया जाय-

नित्य पूजा विधि –

आह्वान, आमंत्रण के लिए अक्षत,स्नान के लिए जल,स्वागत के लिए चंदन अथवा रोली,सुगंध के लिए अगरबत्ती,सम्मान के लिए पुष्प,आहार के लिए नैवेद्य कोई फल मेवा या मिठाई
अभिवन्दन के लिए आरती कपूर अथवा दीपक की।

यह सात पूजा उपकरण सर्वसाधारण के लिए सरल हैं। पुष्प हर जगह- हर समय नहीं मिलते। उनके अभाव में केशर मिश्रित चन्दन से रंगे हुए चावल प्रयोग में लाये जा सकते हैं। प्रथम भगवान की पूजा स्थली पर विशेष रूप से आह्वान आमंत्रित करने के लिये हाथ जोड़कर अभिवन्दन करना चाहिये और उपस्थित का हर्ष व्यक्त करने के लिए माँगलिक अक्षतों (चावलों) की वर्षा करनी चाहिये।

इसके बाद जल, चंदन, अगरबत्ती, पुष्प, नैवेद्य, आरती की व्यवस्था करते हुए उनका स्वागत, सम्मान करना चाहिये। यह विश्वास करना चाहिये कि भगवान सामने उपस्थित हैं और हमारी पूजा प्रक्रिया को- भावनाओं को ग्रहण स्वीकार करेंगे। उपरोक्त सात पूजा उपकरणों के अलग-अलग मंत्र भी हैं। वे याद न हो सकें तो हर मंत्र की आवश्यकता गायत्री से पूरी हो सकती है। इस विधान के अनुसार इस एक ही महामंत्र से कभी पूजा प्रयोजन पूरे कर लेने चाहिये।

यहाँ प्रमुख ईश्वर और उनसे सम्बंधित मंत्रो को बताया गया है श्रद्धानुसार अपने इष्टदेव के मंत्र को भाव विभोर होकर बोलना चाहिए

गणपति स्तोत्र,,,,

गणपति: विघ्नराजो लम्बतुन्ड़ो गजानन:।
द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥
विनायक: चारूकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
द्वादश एतानि नामानि प्रात: उत्थाय य: पठेत्॥
विश्वम तस्य भवेद् वश्यम् न च विघ्नम् भवेत् क्वचित्।

विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।
लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं।
प्रसन्नवदनं ध्यायेतसर्वविघ्नोपशान्तये॥

आदिशक्ति वंदना,,,,,

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

शिव स्तुति,,,,,

कर्पूर गौरम करुणावतारं,
संसार सारं भुजगेन्द्र हारं।
सदा वसंतं हृदयार विन्दे,
भवं भवानी सहितं नमामि॥

विष्णु स्तुति,,,,

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

श्री कृष्ण स्तुति,,,,

कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम।
नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले, वेणु करे कंकणम॥
सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम, कंठे च मुक्तावलि।
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी॥

मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्‌।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्‌॥

श्रीराम वंदना,,,

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥

श्रीरामाष्टक,,,,

हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशवा।
गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा॥
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।
बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्॥

एक श्लोकी रामायण,,,,

आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि श्री रामायणम्॥

सरस्वती वंदना,,,,

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा माम पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्याऽपहा॥

हनुमान वंदना,,,

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्‌।
दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्‌।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥

इसके बाद जप का नम्बर आता है। मंत्र ऐसे उच्चारण करना चाहिये, जिससे कंठ, होठ और जीभ हिलते रहें। उच्चारण तो होता रहे पर इतना हल्का हो कि पास बैठा व्यक्ति भी उसे ठीक तरह से सुन समझ न सके। माला को प्रथम मस्तक पर लगाना चाहिये फिर उससे जप आरंभ करना चाहिये। तर्जनी उंगली का प्रयोग नहीं किया जाता, माला घुमाने में अंगूठा, मध्यमा और अनामिका इन तीनों का ही प्रयोग होता है। जब एक माला पूरी हो जाय तब सुमेरु (बीच का बड़ा दाना) उल्लंघन नहीं करते उसे लौट देते हैं।

अधिक रात गये जप करना हो तो मुँह बन्द करके- उच्चारण रहित मानसिक जप करते हैं। साधारणतया एक माला जप में 6 मिनट लगते हैं। पर अच्छा हो इस गति को और मंद करके 10 मिनट कर लिया जाय। दैनिक उपासना में- जब कि दो ही माला नित्य करनी हैं, गति में तेजी लाना ठीक नहीं। माला न हो तो उंगलियों पर 108 गिन कर एक माला पूरी होने की गणना की जा सकती है। घड़ी सामने रख कर भी समय का अनुमान लगाया जा सकता है।

और अंत में शांति पाठ अवश्य करना चाहिए ,,,,

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:,
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥

॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:

Monday, August 12, 2019

भोजन के बाद न करें ये काम

व्यायामं च व्यवायं च धावनं पानमेव च।युद्धं गीतं च पाठं च मुहुर्तं भुक्तवाँस्त्यजेत्।।
भोजन के पश्चात एक मुहुर्तभर ( लगभग पौन घंटा) व्यायाम, मैथुन, दौड़ना, जलपान, मल्लयुद्ध  ,गाना और पढना आदि कर्म नही करना चाहिए ।
भोजनोपरान्त लगभग एक घण्टे की समयावधि मे किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक श्रम पाचन प्रक्रिया में बाधा डालता है ।

Tuesday, May 14, 2019

असमंजस

असमंजस 

तुझे न देखू तो क्या देखू
तुझे देखलूं ,  तो क्या देखूं|
तू साथ न हो तो, बारात क्या हो
तू साथ हो, तो बारात क्या हो |
तू न हो तो सबसे क्या
तू हो तो सबसे क्या |
तू पास न हो तो क्या मेला
तू पास हो गर तो क्या मेला|
तुझे न सोचूं तो क्या सोचूं
तुझे सोचूं तो क्या सोचूं|

                  -अवनीश द्विवेदी 


Thursday, May 2, 2019

शुभ अशुभ संकेत ! शुभ-अशुभ शकुन विचार

!! शुभ अशुभ संकेत ! शुभ-अशुभ शकुन विचार !!

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शगुन और अपशगुन को सदियो से माना जाता रहा है। मनुष्य के जीवन में होने वाले अच्छे बुरे या होनी अनहोनी की पूर्व जानकारी प्रकृति विभिन्न माध्यम से दे देती है। शुभ और अशुभ संकेतों में विश्वास हमेशा से मानव सोच का एक हिस्सा रहे है।

हम में से कई शुभ और अशुभ संकेतों को अच्छे भाग्य और विपत्ति के लक्षण के रूप में विश्वास करते हैं। लोग शुभ और अशुभ दिनों, पक्षियों ,जानवरों आदि में विश्वास करते है। ऐसे ही कुछ प्रमुख शकुन एवं अपशकुन की जानकारी आपको यहाँ दे रहे हैं लेकिन इन्हें प्रयोग में लाने से पहले किसी विवाद में न पड़ कर खुद समय आने पर इनका निरीक्षण परीक्षण कर सकते हैं।

 जानें क्या है शुभ और क्या अशुभ !!

अगर घर में बिल्ली बच्चे को जन्म देती है तो यह शुभ संकेत है , जिससे जल्दी ही धन संपदा की प्राप्ति होगी, ऐसे कई संकेत प्रकृति हमारे सामने हमेशा रखती है, लेकिन, लोग जानकारी के आभाव में समझ नहीं पाते है। यह कुदरत का नियम है कि जो भी शुभ या अशुभ होना है, उसकी पूर्व सुचना मनुष्य को ऐसे ही संकेतों से मिलती है।

पहले के ऋषि मुनि चिन्तक और आत्म दर्शी होते है। और वह मानव जीवन की, प्रकृति परिवर्तन की, पशु-पक्षियों के व्यवहार, बोली अथवा बार बार होने वाली घटनाओं का अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषण कर सकते है। वृहत संहिता में एक सम्पूर्ण अध्याय इसी विषय पर लिखा गया है।

गाय अचानक गाय घर के दरवाजे के अंदर आकार रम्भाना शुरू कर दें तो, यह संकेत सुख सौभाग्य का सूचक है।

यदि आपके घर के आँगन में बन्दर आम की गुठली कहीं से लाकर डाल दे तो, यह संकेत आपके व्यापार में लाभ होने का सूचक होता है।

जिस घर के दरवाजे पर आकर गाय जोर-जोर से रंभाए तो निश्चय ही उस घर के सुख में वृद्धि होती है।

कौवा आपके घर के मुख्य द्वार के पास यदि कौवा सुबह सुबह बोलता है तो समझ लीजिए कि आज आपके घर कोई आने वाला है। यदि दोपहर को बोलता है तो कोई पत्र या अतिथि आपसे मिलने आएगा।

यदि तीतर घर के दक्षिण दिशा में आवाज करता है तो अचानक सुख सौभाग्य और धन प्राप्ति का योग बनता है।

आपके घर में यदि कोई भी पक्षी चांदी का टुकड़ा या चांदी की अन्य चीज ला कर डाल देता है तो आपको कहीं से अचानक लक्ष्मी की प्राप्ति होगी।

आपके घर की मुंडेर या चार दीवारी पर यदि कोयल या सोन चिड़िया बैठ कर मधुर स्वर करती है तो घर के स्वामी का भाग्योदय होता है तथा सुखी जीवन का प्रतीक संकेत है।

जिस घर की छत या मुंडेर पर कोयल या सोन चिरैय्या चहचहाए, वहां निश्चित ही धन की वृद्धि होती है।

काली चींटियों का घर की छत या दीवार पर घूमना या रेंगना घर की उन्नति के लिए शुभ संकेत माना जाता है। जिस घर में काली चींटियां समूह में घूमती हों वहां ऐश्वर्य वृद्धि होती है, किन्तु मतभेद भी होते हैं।

हाथी यदि आपके घर के मुख्य द्वार के सामने अचानक हाथी आ कर अपनी सूंड उठा कर जोर से स्वर करता है तो वाद विवाद में आपकी जीत होती है और मुकद्दमा आपके पक्ष में होता चला जायगा। जिस घर के द्वार पर हाथी अपनी सूंड ऊंची करे वहां उन्नति, वृद्धि तथा मंगल होने की सूचना मिलती है।

यदि आपके घर की किसी भी दीवार पर सफेद पंक्षी बैठ कर आवाज करता है तो यह संकेत आपकी व्यापार वृद्धि में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।

बिल्ली यदि घर में, छत या किसी कमरें में बिल्ली प्रसव करती है तो समझ लीजिए कि धन संपदा की वृद्धि होने वाली है।

जिस घर में प्राय: बिल्लियां आकर मल त्याग कर जाती हैं, वहां कुछ शुभत्व के लक्षण प्रकट होते हैं।

जिस भवन में बिल्लियां प्राय: लड़ती रहती हैं तो यह शुभ नहीं होता है। वहां शीघ्र ही विघटन की संभावना रहती है विवाद वृद्धि होती है। मतभेद होता है।

कुत्ता घर के सामने की ओर मुख करके कोई कुत्ता रोए तो निश्चय ही घर में कोई विपत्ति आने वाली है अथवा किसी की मृत्यु होने वाली है।

कबूतर घर में प्राकृतिक रूप से कबूतरों का वास शुभ होता है।

मकड़ी के जाले घर में मकड़ी के जाले का होना शुभ नहीं होता हैं।

मोर घर की सीमा में मोर का रहना या आना शुभ होता है।

बिच्छू जिस घर में बिच्छू कतार बना कर बाहर जाते हुए दिखाई दें तो समझ लेना चाहिए कि वहां से लक्ष्मी जाने की तैयारी कर रही हैं। पीला बिच्छू माया का प्रतीक है। पीला बिच्छू घर में निकले तो घर में लक्ष्मी का आगमन होता है।

चमगादड़ घर में चमगादड़ों का वास अशुभ होता है।

छछूंदर जिस भवन में छछूंदरें घूमती हैं वहां लक्ष्मी की वृद्धि होती है।

काले चूहे जिस घर में काले चूहों की संख्या अधिक हो जाती है वहां किसी व्याधि के अचानक होने का अंदेशा रहता है।

आर्थिक या जीवनयापन में आने वाली सभी अड़चनों को दूर कर सकते है यह सफलता के उपाय

शुभ शकुन.....

यदि आपके सामने सुहागन स्त्री अथवा गाय आ जाए। और आप किसी कार्य से जा रहे हैं तो कार्य में सफलता मिलती है।

 कही जाते समय यदि आप कपड़े पहन रहे हैं और जेब से पैसे गिरें तो धन प्राप्ति का संकेत है। इसके विपरीत कपड़े उतारते समय भी ऐसा हो तो भी शुभ होता है।

आप सोकर उठे हों और कोई भिखारी माँगने आ जाए तो ये समझना चाहिए आपके द्वारा दिया गया पैसा (उधार) बिना माँगे वापस आ जाएगा।

सोकर उठते ही नेवला आपको दिख जाए तो गुप्त धन मिलने की संभावना रहती है।

किसी काम के लिए जाते समय आपके सामने कोई भी व्यक्ति गुड़ ले जाता हुआ दिखे तो आशा से अधिक लाभ होता है।

आप लड़की के लिए वर तलाश करने जा रहे हों। घर से निकलते समय चार कुँवारी लड़कियाँ बातचीत करते मिल जाएँ तो शुभ योग होता है।
यदि शरीर पर चिड़िया गंदगी कर दे तो आपने समझना चाहिए आपकी दरिद्रता दूर होने वाली है। ये शुभ शकुन हैं।

रामचरितमानस में वर्णित कुछ शुभ संकेत।

चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई॥

भावार्थ:-  सुंदर शुभदायक शकुन हो रहे हैं। नीलकंठ पक्षी बाईं ओर चारा ले रहा है, मानो सम्पूर्ण मंगलों की सूचना दे रहा हो॥।

दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा॥
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सबाल आव बर नारी॥

भावार्थ:-दाहिनी ओर कौआ सुंदर खेत में शोभा पा रहा है। नेवले का दर्शन भी सब किसी ने पाया। तीनों प्रकार की (शीतल, मंद, सुगंधित) हवा अनुकूल दिशा में चल रही है। श्रेष्ठ (सुहागिनी) स्त्रियाँ भरे हुए घड़े और गोद में बालक लिए आ रही हैं॥

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा॥
मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई॥

भावार्थ:-लोमड़ी फिर-फिरकर (बार-बार) दिखाई दे जाती है। गायें सामने खड़ी बछड़ों को दूध पिलाती हैं। हरिनों की टोली (बाईं ओर से) घूमकर दाहिनी ओर को आई, मानो सभी मंगलों का समूह दिखाई दिया॥

छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी॥
सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना॥

भावार्थ:-क्षेमकरी (सफेद सिरवाली चील) विशेष रूप से क्षेम (कल्याण) कह रही है। श्यामा बाईं ओर सुंदर पेड़ पर दिखाई पड़ी। दही, मछली और दो विद्वान ब्राह्मण हाथ में पुस्तक लिए हुए सामने आए॥

मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार॥

भावार्थ:-सभी मंगलमय, कल्याणमय और मनोवांछित फल देने वाले शकुन मानो सच्चे होने के लिए एक ही साथ हो गए॥
जय रामजी की //

तुम्हारी जुदाई पर मेरी आँखों में आंसू ही नहीं आये

तुम्हारी जुदाई पर
मेरी आँखों में आंसू ही नहीं आये|
आंसू आते भी तो कैसे ,
दिमाग तो मान रहा था कि तुम जुदा हो गए
परंतु दिल मानने तो तैयार नहीं था |
मानता भी तो कैसे
तुम मुझसे जुदा हो गए यह महज भ्रम है तुम्हारा|
मुझको तुम खुद से जुदा चाहकर भी नहीं कर सकते |
मैं हरदम तुम्हारे साथ रहूंगा
कभी जब तुम अकेले में अपनी पुरानी किताबों को पलटोगे ,
तो  वो पाठ जो तुमने सबसे अच्छी तरह पढा होगा मैं वो पाठ हूं |
जिस टॉपिक को समझने की तुमने बड़ी रूचि से कोशिश की थी कभी उस टॉपिक के रूप में मिलूगा|
जो लाइने तुमने बड़ी चाहत से याद की होंगी उस याद के रूप में मिलूगा|

Saturday, April 20, 2019

अगर आप का भी पैसा पी ए सी एल (PACL) में फंसा है तो जरूर पढ़े

अंतिम तिथि: दावे के आवेदन प्राप्त करने की अंतिम तिथि 30 अप्रैल, 2019 है

सरकारी वेबसाइट: PACL निवेशक वेबसाइट https://www.sebipaclrefund.co.in/ पर पहुंच सकते हैं

मूल प्रमाण पत्र: सेबी ने निवेशकों को समिति से प्राप्त विशिष्ट सूचना के बिना अपने मूल पीएसीएल पंजीकरण प्रमाणपत्रों के साथ साझेदारी के खिलाफ चेतावनी दी है। संक्षेप में, किसी को भी मूल प्रमाण पत्र न दें।

हेल्पलाइन नंबर: प्रश्नों / शिकायतों के मामले में, PACL निवेशक हेल्पलाइन नंबर 022-61216966 पर संपर्क कर सकते हैं

दस्तावेजों की पूरी सूची: यहां PACL रिफंड क्लेम आवेदन पत्र ऑनलाइन भरने के लिए आवश्यक दस्तावेजों और जानकारी की पूरी सूची है:

जानकारी चाहिए:-
- आपको पीएसीएल प्रमाणपत्र के अनुसार अपना नाम जमा करना होगा
- दावा राशि (रु। में)
- पैन के अनुसार नाम
- पैन नंबर
-आपका बैंक खाता नंबर
- बैंक का नाम और IFSC कोड।

अपलोड करने के लिए आवश्यक दस्तावेज: -
-अपने पैन की कॉपी
-सबसे ज्यादा पासपोर्ट साइज फोटो
बैंक के लेटर हेड पर sebipaclrefund.co.in पर उपलब्ध निर्धारित प्रारूप के अनुसार अपने नाम छपे हुए या बैंकर के प्रमाणपत्र के साथ रद्द चेक की कॉपी।
-पीएसीएल प्रमाण पत्र की प्रति, और प्राप्तियों, यदि कोई हो।

इससे पहले, पैनल ने पीएसीएल निवेशकों से दावा आवेदनों की प्राप्ति की प्रक्रिया शुरू की थी, जिनकी कुल बकाया राशि 2,500 रुपये तक थी। प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। सत्यापन के बाद, आदेश में पाए जाने वाले दावों के संबंध में धनवापसी की गई और प्रक्रिया पूरी हो गई है।

समिति ने अब PACL लिमिटेड के साथ बकाया दावों वाले सभी निवेशकों से दावे प्राप्त करने का निर्णय लिया है।

Thursday, March 14, 2019

अजीम प्रेम जी ने किया बहुत बड़ा दान

भारतीय समूह विप्रो लिमिटेड के अरबपति चेयरमैन अजीम प्रेमजी, परोपकारी गतिविधियों का समर्थन करने के लिए 7.5 बिलियन डॉलर की कंपनी में 34 प्रतिशत शेयर देंगे, जो भारतीय इतिहास में सबसे उदार दान है।
फाउंडेशन द्वारा प्रेमजी द्वारा नियंत्रित शेयरों को अपरिवर्तनीय रूप से त्याग दिया गया है और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के लिए रखा गया है, फाउंडेशन ने बुधवार को एक बयान में कहा।
"इस कार्रवाई के साथ, श्री प्रेमजी द्वारा योगदान किए गए परोपकारी एंडॉवमेंट कॉर्पस का कुल मूल्य $ 21 बिलियन है, जिसमें विप्रो के आर्थिक स्वामित्व का 67% शामिल है।"
उनकी नींव शिक्षा में सीधे काम करती है और बहु-वर्षीय वित्तीय अनुदान के माध्यम से कम-विशेषाधिकार प्राप्त और हाशिए पर रहने वाले 150 से अधिक गैर-लाभकारी संगठनों का समर्थन करती है। फाउंडेशन ने शिक्षा और संबंधित मानव विकास डोमेन में पेशेवरों को विकसित करने, डिग्री और शिक्षा कार्यक्रमों की पेशकश करने और अनुसंधान का संचालन करने के लिए अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्थापना की।
बयान में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में यह आधार काफी महत्वपूर्ण हो जाएगा। शिक्षा में काम करने वाली टीम मौजूदा 1,600 लोगों से बढ़ेगी और अनुदान देने वाली गतिविधियाँ तिगुनी हो जाएँगी। बेंगलुरु स्थित विश्वविद्यालय 400 से अधिक संकाय सदस्यों के साथ 5,000 छात्रों का विस्तार करेगा। यह फाउंडेशन उत्तर भारत में एक और विश्वविद्यालय स्थापित करने का इरादा रखता है।
अल्ट्रा-अमीर भारतीय, जिनकी कुल संपत्ति $ 50 मिलियन से अधिक है, वे पांच साल पहले की तुलना में कम धर्मार्थ हैं, मिंट अखबार ने पिछले हफ्ते रिपोर्ट की थी, जिसमें प्रेमजी अपवाद थे। बेंगलुरु के 73 वर्षीय अरबपति भारत के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति हैं और ब्लूमबर्ग की वैश्विक अरबपतियों की सूची में 51 वें स्थान पर हैं।

Sunday, March 10, 2019

आदर्श आचार संहिता' लागू, जानिए इसके बारे में सब कुछ

लोकसभा चुनावों के एलान के साथ ही 'आदर्श आचार संहिता' लागू, जानिए इसके बारे में सब कुछ*👇

लोकसभा चुनाव का एलान हो चुका है। और इसी के साथ लागू हो गई है आदर्श आचार संहिता। इस चुनावी माहौल में आपके लिए जरूरी है कि आप चुनाव के तमाम नियमों से अपडेट रहें। भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत पारदर्शी चुनावों के सफल आयोजन की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होती है। इसलिए चुनाव आयोग 'चुनाव आचार संहिता' लागू करता है जिसका पालन चुनाव खत्म होने तक हर पार्टी और उसके उम्मीदवार को करना होता है।

*चुनाव आचार संहिता : क्या, क्यों और कैसे?*

देश में होने वाले सभी चुनावों से पहले चुनाव आयोग आचार संहिता (Code of Conduct) लगाता है। इस दौरान राजनीतिक दलों, उनके उम्मीदवारों और आम जनता को सख्त नियमों का पालन करना होता है। अगर कोई उम्मीदवार इन नियमों का पालन नहीं करता तो चुनाव आयोग उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। उसे चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है और  उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की जा सकती है।

*सामान्य नियम:*

* कोई भी दल ऐसा काम न करे, जिससे जातियों और धार्मिक या भाषाई समुदायों के बीच मतभेद बढ़े या घृणा फैले।
* राजनीतिक दलों की आलोचना कार्यक्रम व नीतियों तक सीमित हो, न कि व्यक्तिगत।
* धार्मिक स्थानों का उपयोग चुनाव प्रचार के मंच के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
* मत पाने के लिए भ्रष्ट आचरण का उपयोग न करें। जैसे-रिश्वत देना, मतदाताओं को परेशान करना आदि।
* किसी की अनुमति के बिना उसकी दीवार, अहाते या भूमि का उपयोग न करें।
* किसी दल की सभा या जुलूस में बाधा न डालें।
* राजनीतिक दल ऐसी कोई भी अपील जारी नहीं करेंगे, जिससे किसी की धार्मिक या जातीय भावनाएं आहत होती हों।

*राजनीतिक सभाओं से जुड़े नियम :*

* सभा के स्थान व समय की पूर्व सूचना पुलिस अधिकारियों को दी जाए।
* दल या अभ्यर्थी पहले ही सुनिश्चित कर लें कि जो स्थान उन्होंने चुना है, वहॉं निषेधाज्ञा तो लागू नहीं है।
* सभा स्थल में लाउडस्पीकर के उपयोग की अनुमति पहले प्राप्त करें।
* सभा के आयोजक विघ्न डालने वालों से निपटने के लिए पुलिस की सहायता करें।



*कुछ और नियम*

*जुलूस संबंधी नियम :*

* जुलूस का समय, शुरू होने का स्थान, मार्ग और समाप्ति का समय तय कर सूचना पुलिस को दें।
* जुलूस का इंतजाम ऐसा हो, जिससे यातायात प्रभावित न हो।
* राजनीतिक दलों का एक ही दिन, एक ही रास्ते से जुलूस निकालने का प्रस्ताव हो तो समय को लेकर पहले बात कर लें।
* जुलूस सड़क के दायीं ओर से निकाला जाए।
* जुलूस में ऐसी चीजों का प्रयोग न करें, जिनका दुरुपयोग उत्तेजना के क्षणों में हो सके।

*मतदान के दिन संबंधी नियम :*

* अधिकृत कार्यकर्ताओं को बिल्ले या पहचान पत्र दें।
* मतदाताओं को दी जाने वाली पर्ची सादे कागज पर हो और उसमें प्रतीक चिह्न, अभ्यर्थी या दल का नाम न हो।
* मतदान के दिन और इसके 24 घंटे पहले किसी को शराब वितरित न की जाए।
* मतदान केन्द्र के पास लगाए जाने वाले कैम्पों में भीड़ न लगाएं।
* कैम्प साधारण होने चाहिए।
* मतदान के दिन वाहन चलाने पर उसका परमिट प्राप्त करें।

*सत्ताधारी दल के लिए नियम :*

* कार्यकलापों में शिकायत का मौका न दें।
* मंत्री शासकीय दौरों के दौरान चुनाव प्रचार के कार्य न करें।
* इस काम में शासकीय मशीनरी तथा कर्मचारियों का इस्तेमाल न करें।
* सरकारी विमान और गाड़ियों का प्रयोग दल के हितों को बढ़ावा देने के लिए न हो।
* हेलीपेड पर एकाधिकार न जताएं।

Sunday, March 3, 2019

बारह महाजन

स्वयम्भुर्नारद:शम्भु कुमार: कपिलोमनु: 

प्रह्लादोजनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम। 

ये12 महाजन हैं-स्वयंभू, शंभु, नारद, सनत कुमार, कपिल, मनु, जनक, भीष्म, बली, व्यास जी, प्रह्लाद और यमराज। 

Thursday, January 24, 2019

गरुड़ पुराण में वर्णित नरक

गरुड़ पुराण में वर्णन है 36 नर्क का, जानिए किसमें कैसे दी जाती है सजा
हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखी अनेक कथाओं में स्वर्ग और नर्क के बारे में बताया गया है। पुराणों के अनुसार स्वर्ग वह स्थान होता है जहां देवता रहते हैं और अच्छे कर्म करने वाले इंसान की आत्मा को भी वहां स्थान मिलता है, इसके विपरीत बुरे काम करने वाले लोगों को नर्क भेजा जाता है, जहां उन्हें सजा के तौर पर गर्म तेल में तला जाता है और अंगारों पर सुलाया जाता है।
यह भी पढ़े- गरुड़ पुराण- इन 5 कामों से कम होती है उम्र
हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण, कठोपनिषद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। आज हम आपको उन नर्कों के बारे में संक्षिप्त रूप से बता रहे हैं-
1. महावीचि- यह नर्क पूरी तरह रक्त यानी खून से भरा है और इसमें लोहे के बड़े-बड़े कांटे हैं। जो लोग गाय की हत्या करते हैं, उन्हें इस नर्क में यातना भुगतनी पड़ती है।
2. कुंभीपाक- इस नर्क की जमीन गरम बालू और अंगारों से भरी है। जो लोग किसी की भूमि हड़पते हैं या ब्राह्मण की हत्या करते हैं। उन्हें इस नर्क में आना पड़ता है।
3. रौरव- यहां लोहे के जलते हुए तीर होते हैं। जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इन तीरों से बींधा जाता है।
4. मंजूष- यह जलते हुए लोहे जैसी धरती वाला नर्क है। यहां उनको सजा मिलती है, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं या कैद में रखते हैं।
5. अप्रतिष्ठ- यह पीब, मूत्र और उल्टी से भरा नर्क है। यहां वे लोग यातना पाते हैं, जो ब्राह्मणों को पीड़ा देते हैं या सताते हैं।
6. विलेपक- यह लाख की आग से जलने वाला नर्क है। यहां उन ब्राह्मणों को जलाया जाता है, जो शराब पीते हैं।
7. महाप्रभ- इस नर्क में एक बहुत बड़ा लोहे का नुकीला तीर है। जो लोग पति-पत्नी में फूट डालते हैं, पति-पत्नी के रिश्ते तुड़वाते हैं वे यहां इस तीर में पिरोए जाते हैं।
8. जयंती- यहां जीवात्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। जो लोग पराई औरतों के साथ संभोग करते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
9. शाल्मलि- यह जलते हुए कांटों से भरा नर्क है। जो औरत कई पुरुषों से संभोग करती है व जो व्यक्ति हमेशा झूठ व कड़वा बोलता है, दूसरों के धन और स्त्री पर नजर डालता है। पुत्रवधू, पुत्री, बहन आदि से शारीरिक संबंध बनाता है व वृद्ध की हत्या करता है, ऐसे लोगों को यहां लाया जाता है।
10. महारौरव- इस नर्क में चारों तरफ आग ही आग होती है। जैसे किसी भट्टी में होती है। जो लोग दूसरों के घर, खेत, खलिहान या गोदाम में आग लगाते हैं, उन्हें यहां जलाया जाता है।
11. तामिस्र- इस नर्क में लोहे की पट्टियों और मुग्दरों से पिटाई की जाती है। यहां चोरों को यातना मिलती है।
12. महातामिस्र- इस नर्क में जौंके भरी हुई हैं, जो इंसान का रक्त चूसती हैं। माता, पिता और मित्र की हत्या करने वाले को इस नर्क में जाना पड़ता है।
13. असिपत्रवन- यह नर्क एक जंगल की तरह है, जिसके पेड़ों पर पत्तों की जगह तीखी तलवारें और खड्ग हैं। मित्रों से दगा करने वाला इंसान इस नर्क में गिराया जाता है।
14. करम्भ बालुका- यह नर्क एक कुएं की तरह है, जिसमें गर्म बालू रेत और अंगारे भरे हुए हैं। जो लोग दूसरे जीवों को जलाते हैं, वे इस कुएं में गिराए जाते हैं।
15. काकोल- यह पीब और कीड़ों से भरा नर्क है। जो लोग छुप-छुप कर अकेले ही मिठाई खाते हैं, दूसरों को नहीं देते, वे इस नर्क में लाए जाते हैं।
16. कुड्मल- यह मूत्र, पीब और विष्ठा (उल्टी) से भरा है। जो लोग दैनिक जीवन में पंचयज्ञों ( ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) का अनुष्ठान नहीं करते वे इस नर्क में आते हैं।
17. महाभीम- यह नर्क बदबूदार मांस और रक्त से भरा है। जो लोग ऐसी चीजें खाते हैं, जिनका शास्त्रों ने निषेध बताया है, वो लोग इस नर्क में गिरते हैं।
18. महावट- इस नर्क में मुर्दे और कीड़े भरे हैं, जो लोग अपनी लड़कियों को बेचते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
19. तिलपाक- यहां दूसरों को सताने, पीड़ा देने वाले लोगों को तिल की तरह पेरा जाता है। जैसे तिल का तेल निकाला जाता है, ठीक उसी तरह।
20. तैलपाक- इस नर्क में खौलता हुआ तेल भरा है। जो लोग मित्रों या शरणागतों की हत्या करते हैं, वे यहां इस तेल में तले जाते हैं।
21. वज्रकपाट- यहां वज्रों की पूरी श्रंखला बनी है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते हैं, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं।
22. निरुच्छवास- इस नर्क में अंधेरा है, यहां वायु नहीं होती। जो लोग दिए जा रहे दान में विघ्न डालते हैं वे यहां फेंके जाते हैं।
23. अंगारोपच्य- यह नर्क अंगारों से भरा है। जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं। वे यहां जलाए जाते हैं।
24. महापायी- यह नर्क हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य बोलने वाले यहां औंधे मुंह गिराए जाते हैं।
25. महाज्वाल- इस नर्क में हर तरफ आग है। जो लोग हमेशा ही पाप में लगे रहते हैं वे इसमें जलाए जाते हैं।
26. गुड़पाक- यहां चारों ओर गरम गुड़ के कुंड हैं। जो लोग समाज में वर्ण संकरता फैलाते हैं, वे इस गुड़ में पकाए जाते हैं।
27. क्रकच- इस नर्क में तीखे आरे लगे हैं। जो लोग ऐसी महिलाओं से संभोग करते हैं, जिसके लिए शास्त्रों ने निषेध किया है, वे लोग इन्हीं आरों से चीरे जाते हैं।
28. क्षुरधार- यह नर्क तीखे उस्तरों से भरा है। ब्राह्मणों की भूमि हड़पने वाले यहां काटे जाते हैं।
29. अम्बरीष- यहां प्रलय अग्रि के समान आग जलती है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।
30. वज्रकुठार- यह नर्क वज्रों से भरा है। जो लोग पेड़ काटते हैं वे यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।
31. परिताप- यह नर्क भी आग से जल रहा है। जो लोग दूसरों को जहर देते हैं या मधु (शहद) की चोरी करते हैं, वे यहां जलाए जाते हैं।
32. काल सूत्र- यह वज्र के समान सूत से बना है। जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं। वे यहां सजा पाते हैं।
33. कश्मल- यह नर्क नाक और मुंह की गंदगी से भरा होता है। जो लोग मांसाहार में ज्यादा रुचि रखते हैं, वे यहां गिराए जाते हैं।
34. उग्रगंध- यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नर्क है। जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते, वे यहां लाए जाते हैं।
35. दुर्धर- यह नर्क जौक और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नर्क में भेजे जाते हैं।
36. वज्रमहापीड- यहां लोहे के भारी वज्र से मारा जाता है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, किसी प्राणी की हत्या कर उसे खाते हैं, दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्र चुराते हैं, जो दूसरों के फल चुराते हैं, धर्म को नहीं मानते ऐसे सारे लोग यहां लाए जाते हैं।
नमः शिवाय

Wednesday, January 23, 2019

माघ स्नान की महिमा

.                       "माघ स्नान माहात्म्य"


          'पद्म पुराण' के उत्तर खण्ड में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि व्रत, दान व तपस्या से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में ब्राह्ममुहूर्त में उठकर स्नानमात्र से होती है।

               व्रतैर्दानस्तपोभिश्च  न  तथा  प्रीयते  हरिः।
               माघमज्जनमात्रेण यथा प्रीणाति केशवः।।

          अतः सभी पापों से मुक्ति व भगवान की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान व्रत करना चाहिए। इसका प्रारम्भ पौष की पूर्णिमा से होता है।
          माघ मास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहाँ कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है। इस मास की प्रत्येक तिथि पर्व हैं। कदाचित् अशक्तावस्था में पूरे मास का नियम न ले सकें तो शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था की है तीन दिन अथवा एक दिन अवश्य माघ-स्नान व्रत का पालन करें। इस मास में स्नान, दान, उपवास और भगवत्पूजा अत्यन्त फलदायी है।
          माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'षटतिला एकादशी' के नाम से जानी जाती है। इस दिन काले तिल तथा काली गाय के दान का भी बड़ा माहात्म्य है।
1. तिल मिश्रित जल से स्नान, 2. तिल का उबटन, 3. तिल से हवन, 4. तिलमिश्रित जल का पान व तर्पण, 5. तिलमिश्रित भोजन, 6. तिल का दान। ये छः कर्म पाप का नाश करने वाले हैं।
          माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या 'मौनी अमावस्या' के रूप में प्रसिद्ध है। इस पवित्र तिथि पर मौन रहकर अथवा मुनियों के समान आचरणपूर्वक स्नान दान करने का विशेष महत्त्व है।
          अमावस्या के दिन (04 फरवरी) सोमवार का योग होने पर उस दिन देवताओं को भी दुर्लभ हो ऐसा पुण्यकाल होता है, क्योंकि गंगा, पुष्कर एवं दिव्य अंतरिक्ष और भूमि के जो सब तीर्थ हैं, वे 'सोमवती (दर्श) अमावस्या' के दिन के जप, ध्यान, पूजन करने पर विशेष धर्मलाभ प्रदान करते हैं।
          मंगलवारी चतुर्थी, रविवारी सप्तमी, बुधवारी अष्टमी, सोमवारी अमावस्या, ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं। इनमें किया गया स्नान, दान व श्राद्ध अक्षय होता है।
          माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् 'वसंत पंचमी' को माँ सरस्वती का आविर्भाव-दिवस माना जाता है। इस दिन (10 फरवरी) प्रातः सरस्वती-पूजन करना चाहिए। पुस्तक और लेखनी (कलम) में भी देवी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है, अतः उनकी भी पूजा की जाती है।
          शुक्ल पक्ष की सप्तमी को 'अचला सप्तमी' कहते हैं। षष्ठी के दिन एक बार भोजन करके सप्तमी (12 फऱवरी) को सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से पापनाश, रूप, सुख-सौभाग्य और सदगति प्राप्त होती है।
          ऐसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है, तथापि उनमें भी माघी पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। इस दिन (19 फरवरी) स्नानादि से निवृत्त होकर भगवत्पूजन, श्राद्ध तथा दान करने का विशेष फल है। जो इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर भगवान विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है।
          माघी पूर्णिमा के दिन तिल, सूती कपड़े, कम्बल, रत्न, पगड़ी, जूते आदि का अपने वैभव के अनुसार दान करके मनुष्य स्वर्गलोक में सुखी होता है। 'मत्स्य पुराण' के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है

Sunday, January 20, 2019

माँ

मां एक ऐसा शब्द जो कि अपने आप में परिपूर्ण शब्द है |मां हमारे अस्तित्व का मूल कारण है |मां हमारी पैदाइश में भगवान की साझेदार है |हमने भगवान को नही देखा है न ही छुआ है परंतु अगर भगवान मिलते तो शायद मां के जैसा ही व्यवहार करते|जब एक बच्चा पैदा होता है तो वह रोने के अलावा कुछ नहीं जानता|मां उसे धीरे धीरे हर चीज़ सिखाती है |जब एक मां गर्भ धारण करती है तो वह केवल नये प्राणी को अस्तित्व में लाने का प्रयास ही नहीं करती अपितु वह अपने शरीर  का भी बलिदान करती है |गर्भ में बच्चा मां से रक्त, मांस, विचार और व्यवहार लेता है |जब कोई स्त्री गर्भवती होती है तो उसे अनेक प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं जो कि दुनियां का कोई भी पुरुष नही सह सकता |फिर भी मां हसते हसते सब सहकर नये प्राणी को अस्तित्व में लाती है |संसार में जितने भी जीव हैं सब किसी न किसी मां की कोख से ही जन्म प्राप्त करते हैं |बिना मां के किसी का जन्म संभव ही नहीं है |जब एक जीव जन्म लेताहै तो उसे रोने के सिवा कुछ भी नहीं आता है |मां अपने नवजात शिशु की हर आवश्यकता का खयाल रखती है |बच्चा बोल नहीं पाता कि उसे क्या चाहिये पर मां समझ जाती है |बच्चे की भूख, प्यास, तकलीफ सब मां तुरंत समझ जाती है |बच्चा कब क्या चाहता है यह बात केवल मां समझती है |जो वात्सल्य हमें मां की गोंद में मिलता है धरती पर कहीं नही मिल सकता |हमारे धर्मग्रंथों में भी मां के महत्व को सर्वोपरि बताया गया है |हमारे धर्मग्रंथ बताते हैं कि मां प्रथम गुरू है, मां भगवान है, मां की सेवा से सम्पूर्ण देवी देवता की सेवा का फल प्राप्त हो जाता है |
दुनिया में कोई आपकी मुस्कान के लिए अपनी कुर्बानी दे सकता है तो वह केवल मां है |
दुनियां केवल मां ही है जो आपके हर अपराध को क्षमा कर देती है |
दुनिया में मां ही है जो तुम्हारी खुशी के लिए अपनी जिंदगी तक की कुर्बानी हंसकर दे देती है |
आजकल विशेषरूप से शहरों में वृद्धाश्रम की भरमार हो गयी है | वृद्धाश्रम हमारी सभ्यता पर कलंक है |जिससे हमें रूप रंग तन मन धन जीवन आचार विचार व्यवहार स्वभाव प्रभाव मिला हमारे घरों में उनकी ही जगह न रही|जिस मां ठंड गरम की परवाह किये बिना तुम्हें दुलारों से पाला उसके तुम वृद्धाश्रम छोड़ आये |मां को त्यागने वालों उसके दूध से जो तुम्हारा पोषण हुआ उसे कैसे त्याग सकते हो |जिसने तुम्हें पलकों पर रखा तुम उसे वृद्धाश्रम में रखते हो|
जिसने अपनी माँ के चरणों में प्रणाम कर लिया उसे किसी मंदिर में जाने की जरूरत नहीं है |मां की गोद का सुख लेने के लिए हमारा भगवान गोकुल में पैदा होता है |दुनियां में मां की गोंद से पवित्र कोई जगह नहीं है |धरती पर मां के चरणों से पूजनीय दूसरी जगह नहीं है |मां के हाथों के कोमल स्पर्श से बढकर कोई सुख नहीं है |मां की सिखाई बातों से बढकर कोई शिक्षा नहीं है |
मां से बढकर कोई गुरू नहीं है |मां इतना कुछ हमे देती है और बदले में कुछ भी नहीं चाहती | जिसकी दुआ केवल हमारे लिए होती है |
कैसी विडम्बना है कि लोग लड़की के प्यार में पागल होकर आत्महत्या कर लेते हैं परंतु मां के लिए जरा सा कष्ट नहीं उठा सकते|बड़े भाग्यवान हैं वो लोग जिन्हें मां मिली मां का प्यार मिला |वे सभी लोग जिनकी मां है अपनी माँ को सम्मान दें प्यार दे भगवान उनका विशेष खयाल रखेगा |
जय हिंद जय भारत जय श्री राम |

Wednesday, January 16, 2019

पारिजात वृक्ष

!!! पारिजात वृक्ष : इस वृक्ष के कारण हुआ था इंद्र और कृष्ण में युद्ध !!!

पारिजात वृक्ष तो पुरे भारत में पाये जाते है, लेकिन किंटूर में पाया जाने वाला यह पारिजात वृक्ष अपने आप कई विशेषताए रखता है और यह अपनी तरह का पुरे भारत में इकलौता पारिजात वृक्ष है।

उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिला मुख्यालय से ३८ किलोमीटर कि दूरी पर किंटूर गाँव है।

इस जगह का नामकरण पाण्डवों कि माता कुन्ती के नाम पर हुआ है। यहाँ पर पाण्डवों ने माता कुन्ती के साथ अपना अज्ञातवास बिताया था।

इसी किंटूर गाँव में भारत का एक मात्र पारिजात का पेड़ पाया जाता है। कहते है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से सारी थकान मिट जाती है |

*** पारिजात वृक्ष के बारे में -

आमतौर पर पारिजात वृक्ष १० फीट  से २५ फीट तक ऊंचे होता है, पर किंटूर में स्तिथ पारिजात वृक्ष लगभग ४५ फीट ऊंचा और ५० फीट मोटा है।

इस पारिजात वृक्ष कि सबसे बड़ी विशेषता यह है कि, यह अपनी तरह का  इकलौता पारिजात वृक्ष है, क्योंकि इस पारिजात वृक्ष पर बीज नहीं लगते है तथा इस पारिजात वृक्ष कि कलम बोने से भी दूसरा वृक्ष तैयार नहीं होता है।

पारिजात वृक्ष  पर जून के आस पास बेहद खूबसूरत सफ़ेद रंग के फूल खिलते है। पारिजात के फूल केवल रात कि खिलते है और सुबह होते ही मुरझा जाते है। 

इन फूलों का लक्ष्मी पूजन में विशेष महत्तव है। पर एक बात ध्यान रहे कि पारिजात वृक्ष के वे ही फूल पूजा में काम लिए जाते है जो वृक्ष से टूट कर गिर जाते है, वृक्ष से फूल तोड़ने कि मनाही है।

पारिजात वृक्ष का वर्णन हरिवंश पुराण में भी आता है। हरिवंश पुराण में इसे कल्पवृक्ष कहा गया है जिसकी उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी और जिसे इंद्र ने स्वर्गलोक में स्थपित कर दिया था।

हरिवंश पुराण के अनुसार इसको छूने मात्र से ही देव नर्त्तकी उर्वशी कि थकान मिट जाती थी।

*** पारिजात वृक्ष के किंटूर पहुंचने की कहानी !!!

एक बार देवऋषि नारद जब धरती पर कृष्ण से मिलने आये तो अपने साथ पारिजात के सुन्दर पुष्प ले कर आये।  उन्होंने वे पुष्प श्री कृष्ण को भेट किये।

श्री कृष्ण ने पुष्प साथ बैठी अपनी पत्नी रुक्मणि को दे दिए।

लेकिन जब श्री कृष्ण कि दूसरी पत्नी सत्य भामा को पता चला कि स्वर्ग से आये पारिजात के सारे पुष्प श्री कृष्ण ने रुक्मणि को दे दिए तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने श्री कृष्ण के सामने जिद पकड़ ली कि, उन्हें अपनी वाटिका के लिय  पारिजात वृक्ष चाहिए। 

श्री कृष्ण के लाख समझाने पर भी सत्य भामा नहीं मानी।

सत्यभामा कि ज़िद के आगे झुकते हुए श्री कृष्ण ने अपने दूत को स्वर्ग पारिजात वृक्ष लाने के लिए भेजा पर इंद्र ने पारिजात वृक्ष देने से मना कर दिया। 

दूत ने जब यह बात आकर श्री कृष्ण को बताई तो उन्होंने स्व्यं ही इंद्र पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को पराजित करके पारिजात वृक्ष को जीत लिया।

इससे रुष्ट होकर इंद्र ने पारिजात वृक्ष को फल से वंचित हो जाने का श्राप दे दिया और तभी से पारिजात वृक्ष फल विहीन हो गया।

श्री कृष्ण ने पारिजात वृक्ष को ला कर सत्यभामा कि वाटिका में रोपित कर दिया, पर सत्यभामा को सबक सिखाने के लिया ऐसा कर दिया कि, जब पारिजात वृक्ष पर पुष्प आते तो गिरते वो रुक्मणि कि वाटिका में। 

और यही कारण है कि, पारिजात के पुष्प वृक्ष के नीचे न गिरकर वृक्ष से दूर गिरते है। इस तरह पारिजात वृक्ष , स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गया।

*** महाभारत काल से किंटूर के पारिजात वृक्ष का संबंध !!!

इसके बाद जब पाण्डवों ने किंटूर में अज्ञातवास किया तो उन्होंने वहाँ माता कुन्ती के लिए भगवन शिव के एक मंदिर कि स्थापना कि जो कि, अब कुन्तेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। 

कहते है कि, माता कुन्ती पारिजात के पुष्पों से भगवान् शंकर कि पूजा अर्चना कर सके इसलिए पांडवों ने सत्यभामा कि वाटिका से पारिजात वृक्ष को लाकर यहाँ स्थापित कर दिया और तभी से पारिजात वृक्ष यहाँ पर है।

*** अन्य किवंदतियां भी है पारिजात वृक्ष के बारे में !!!

एक अन्य मान्यता यह भी है कि, पारिजात नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी, जिसे भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था।

लेकिन अथाग प्रयास करने पर भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्रेम कों स्वीकार नहीं किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने आत्महत्या कर ली।

जिस स्थान पर पारिजात की क़ब्र बनी, वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया।

*** सरकार द्वारा पारिजात वृक्ष पर जारी डाक टिकट !!!

पारिजात वृक्ष के ऐतिहासिक महत्तव व इसकी दुर्लभता को देखते हुए सरकार ने इसे संरक्षित घोषित कर दिया है। भारत सरकार ने इस पर एक डाक टिकट भी जारी किया है।

*** औषधीय गुणों से भी भरपूर है पारिजात वृक्ष !!!

पारिजात को आयुर्वेद में हरसिंगार भी कहा जाता है। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलों के रस का सेवन किया जाए तो हृदय रोग से बचा जा सकता है।

इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खाँसी ठीक हो जाती है।

इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते हैं।

पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोंपल को यदि पाँच काली मिर्च के साथ महिलाएँ सेवन करें तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है।

वहीं पारिजात के बीज जहाँ बालों के लिए शीरप का काम करते हैं तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर दे|

Insurance is not investment

  Insurance is not investment. Insurance and investments are two different financial instruments that serve different purposes. Insurance ...