Thursday, December 12, 2019

असमंजस

असमंजस की प्रबल भंवर से जैसे तैसे निकलना है।
जिससे कुछ भी कहना मुश्किल उससे सबकुछ कहना है।
धक-धक दिल करता है पैरों में कंपन भारी है
लब खुलेंगे कैसे उसके आगे बस इसकी तैयारी है।

Wednesday, December 4, 2019

गुलाब देखा

गुलाबी साइकिल पर बैठा हुआ गुलाब देखा।
लगा ऐसा कि जैसे कोई ख़्वाब देखा।
काट ली खुद च्यूटियां यकीं आया तब
वाकई इन आंखों ने कुछ लाजवाब देखा।।

Tuesday, August 27, 2019

राजा मोरध्वज की कथा

राजा  मोरध्वज की कथा,,,,

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद अर्जुन को वहम हो गया की वो श्रीकृष्ण के सर्वश्रेष्ठ भक्त है, अर्जुन सोचते की कन्हैया ने मेरा रथ चलाया, मेरे साथ रहे इसलिए में भगवान का सर्वश्रेष्ठ भक्त हूँ। अर्जुन को क्या पता था की वो केवल भगवान के धर्म की स्थापना का जरिया था। फिर भगवान ने उसका गर्व तोड़ने के लिए उसे एक परीक्षा का गवाह बनाने के लिए अपने साथ ले गए।

श्रीकृष्ण और अर्जुन ने जोगियों का वेश बनाया और वन से एक शेर पकड़ा और पहुँच जाते है भगवान विष्णु के परम-भक्त राजा मोरध्वज के द्वार पर। राजा मोरध्वज बहुत ही दानी और आवभगत वाले थे अपने दर पे आये किसी को भी वो खाली हाथ और बिना भोज के जाने नहीं देते थे।

दो साधु एक सिंह के साथ दर पर आये है ये  जानकर राजा नंगे पांव दौड़के द्वार पर गए और भगवान के तेज से नतमस्तक हो आतिथ्य स्वीकार करने के लिए कहा। भगवान कृष्ण ने मोरध्वज से कहा की हम मेजबानी तब ही स्वीकार करेंगे जब राजा उनकी शर्त मानें, राजा ने जोश से कहा आप जो भी कहेंगे मैं तैयार हूँ।

भगवान कृष्ण ने कहा, हम तो ब्राह्मण है कुछ भी खिला देना पर ये सिंह नरभक्षी है, तुम अगर अपने इकलौते बेटे को अपने हाथों से मारकर इसे खिला सको तो ही हम तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे। भगवान की शर्त सुन मोरध्वज के होश उड़ गए, फिर भी राजा अपना आतिथ्य-धर्म नहीं छोडना चाहता था। उसने भगवान से कहा प्रभु ! मुझे मंजूर है पर एक बार में अपनी पत्नी से पूछ लूँ ।

भगवान से आज्ञा पाकर राजा महल में गया तो राजा का उतरा हुआ मुख देख कर पतिव्रता रानी ने राजा से कारण पूछा। राजा ने जब सारा हाल बताया तो रानी के आँखों से अश्रु बह निकले। फिर भी  वो अभिमान से राजा से बोली की आपकी आन पर मैं अपने सैंकड़ों पुत्र कुर्बान कर सकती हूँ। आप साधुओ को आदरपूर्वक अंदर ले आइये।

अर्जुन ने भगवान से पूछा- माधव ! ये क्या माजरा है ? आप ने ये क्या मांग लिया ? कृष्ण बोले -अर्जुन तुम देखते जाओ और चुप रहो।
राजा तीनो को अंदर ले आये और भोजन की तैयारी शुरू की। भगवान को छप्पन भोग परोसा गया पर अर्जुन के गले से उत्तर नहीं रहा था। राजा ने स्वयं जाकर पुत्र को तैयार किया। पुत्र भी तीन साल का था नाम था रतन कँवर, वो भी मात पिता का भक्त था, उसने भी हँसते हँसते अपने प्राण दे दिए परंतु उफ़ ना की ।

राजा रानी ने अपने हाथो में आरी लेकर पुत्र के दो  टुकड़े किये और सिंह को परोस दिया। भगवान ने भोजन ग्रहण किया पर जब रानी ने पुत्र का आधा शरीर देखा तो वो आंसू रोक न पाई।  भगवान इस बात पर गुस्सा हो गए की लड़के का एक फाड़ कैसे बच गया? भगवान रुष्ट होकर जाने लगे तो राजा रानी रुकने की मिन्नतें करने लगे।

अर्जुन को अहसास हो गया था की भगवान मेरे ही गर्व को तोड़ने के लिए ये सब कर रहे है। वो स्वयं भगवान के पैरों में गिरकर विनती करने लगा और कहने लगा की आप ने मेरे झूठे मान को तोड़ दिया है। राजा रानी के बेटे को उनके ही हाथो से मरवा दिया और अब रूठ के जा रहे हो, ये उचित नही है। प्रभु ! मुझे माफ़ करो और भक्त का कल्याण करो।

तब केशव ने अर्जुन का घमंड टूटा जान रानी से कहा की वो अपने पुत्र को आवाज दे। रानी ने सोचा पुत्र तो मर चुका है, अब इसका क्या मतलब !! पर साधुओं की आज्ञा मानकर उसने पुत्र रतन कंवर को आवाज लगाई।

कुछ ही क्षणों में चमत्कार हो गया । मृत रतन कंवर जिसका शरीर शेर ने खा लिया था, वो हँसते हुए आकर अपनी माँ से लिपट गया। भगवान ने मोरध्वज और रानी को अपने विराट स्वरुप का दर्शन कराया। पूरे दरबार में वासुदेव कृष्ण की जय जय कार गूंजने लगी।

भगवान के दर्शन पाकर अपनी भक्ति सार्थक जान मोरध्वज की ऑंखें भर आई और वो बुरी तरह बिलखने लगे। भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो राजा रानी ने कहा भगवान एक ही वर दो की अपने भक्त की ऐसी कठोर परीक्षा न ले, जैसी आप ने हमारी ली है। तथास्तु कहकर भगवान ने उसको आशीर्वाद दिया और पूरे परिवार को मोक्ष दिया।

                      ।। जय श्री कृष्णा ।।
            🙏🙏 ।।जय श्री राधे राधे जी।।🙏🙏

Friday, August 16, 2019

नित्य पूजन मन्त्र – इनके जपने से जीवन पर्यन्त रहेगी ईश्वर कृपा

नित्य पूजन मन्त्र – इनके जपने से जीवन पर्यन्त रहेगी ईश्वर कृपा??????

हिन्दु धर्म में सभी कष्टों के निवारण एवं ईश्वर प्राप्ति के लिए नित्य पुजा  का मार्ग श्रेष्ट माना गया है। नित्य पूजन और नित्य पूजा मंत्र जपने से श्रद्धा और विश्वास का ही जन्म नही होता है अपितु मन में एकाग्रता और दृढ इच्छाशक्ति का संचार होता है और दृढ संकल्प से हम किसी भी तरह के कार्य को कर पाने में सक्षम हो पाते है।

नियमित उपासना  के लिए पूजा-स्थली की स्थापना आवश्यक है। घर में एक ऐसा स्थान तलाश करना चाहिये जहाँ अपेक्षाकृत एकान्त रहता हो, आवागमन और कोलाहल कम-से-कम हो। ऐसे स्थान पर एक छोटी चौकी को पीत वस्त्र से सुसज्जित कर उस पर काँच से मढ़ा भगवान का सुन्दर चित्र स्थापित करना चाहिये। गायत्री की उपासना सर्वोत्कृष्ट मानी गई है।

 इसलिये उसकी स्थापना की प्रमुखता देनी चाहिये। यदि किसी का दूसरे देवता के लिये आग्रह हों तो उन देवता का चित्र भी रखा जा सकता है। शास्त्रों में गायत्री के बिना अन्य सब साधनाओं का निष्फल होना लिखा है। इसलिये यदि अन्य देवता को इष्ट माना जाय और उसकी प्रतिमा स्थापित की जाय तो भी गायत्री का चित्र प्रत्येक दशा में साथ रहना ही चाहिये।

अच्छा तो यह है कि एक ही इष्ट गायत्री महाशक्ति को माना जाय और एक ही चित्र स्थापित किया जाय। उससे एकनिष्ठा और एकाग्रता का लाभ होता है। यदि अन्य देवताओं की स्थापना का भी आग्रह हो तो उनकी संख्या कम-से-कम रखनी चाहिये।

 जितने देवता स्थापित किये जायेंगे, जितनी प्रतिमाएं बढ़ाई जायेंगी- निष्ठा उसी अनुपात से विभाजित होती जायेगी। इसलिये यथासंभव एक अन्यथा कम-से-कम छवियाँ पूजा स्थली पर प्रतिष्ठापित करनी चाहिये।

पूजा-स्थली के पास उपयुक्त व्यवस्था के साथ पूजा के उपकरण रखने चाहिये। अगरबत्ती, पंच-पात्र, चमची, धूपबत्ती, आरती, जल गिराने की तस्तरी, चंदन, रोली, अक्षत, दीपक, नैवेद्य, घी, दियासलाई आदि उपकरण यथा-स्थान डिब्बों में रखने चाहिये। आसन कुशाओं का उत्तम है। चटाई में काम चल सकता है।

 आवश्यकतानुसार मोटा या गुदगुदा आसन भी रखा जा सकता है। माला चन्दन या तुलसी की उत्तम है। शंख, सीपी मूँगा जैसी जीव शरीरों से बनने वाली मालाएं निषिद्ध हैं। इसी प्रकार किसी पशु का चमड़ा भी आसन के स्थान पर प्रयोग नहीं करना चाहिये

पूजा उपचार के लिये प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। स्थान और पूजा उपकरणों की सफाई नित्य करनी चाहिये। जहाँ तक हो सके नित्यकर्म से शौच, स्नान आदि से निवृत्त होकर ही पूजा पर बैठना चाहिये। रुग्ण या अशक्त होने की दशा में हाथ-पैर, मुँह आदि धोकर भी बैठा जा सकता है।

पूजा का न्यूनतम कार्य तो निर्धारित रखना ही चाहिये। उतना तो पूरा कर ही लिया जाय। यदि प्रातः समय न मिले तो सोने से पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की पूर्ति की जाय। यदि बाहर प्रवास में रहना हो तो मानसिक ध्यान पूजा भी की जा सकती है। ध्यान में नित्य की हर पूजा पद्धति का स्मरण और भाव कर लेने को मानसिक पूजा कहते हैं।

प्रात: कर-दर्शनम,,,,

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम॥

सबसे पहले शरीर, मन और इन्द्रियों को- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की शुद्धि के लिये आत्म-शुद्धि के पंचोपचार करने चाहिये। यही संक्षिप्त ब्रह्म-संध्या है।

(1) बायें हाथ में एक चम्मच जल रख कर दाहिने से ढंका जाय। पवित्रीकरण का मंत्र अथवा गायत्री मंत्र पढ़ कर उस जल को समस्त शरीर पर छिड़का जाय,

(2) तीन बार, तीन चम्मच भर कर, तीन आचमन किये जांय। आचमनों के तीन मंत्र पुस्तकों में हैं, वे याद न हों तो हर आचमन पर गायत्री मंत्र पढ़ा जा सकता है।

(3) चोटी में गाँठ लगाई जाय। अथवा शिखा स्थान को स्पर्श किया जाय। शिखा बंधन का मंत्र याद न हो तो गायत्री मंत्र पढ़ा जाय।

(4) दाहिना नथुना बन्द कर बायें से साँस खींची जाय। भीतर रोकी जाय और बायाँ नथुना बन्द करके दाहिने छेद से साँस बाहर निकाली जाय। यह प्राणायाम है। प्राणायाम का मंत्र याद न हो तो गायत्री मंत्र मन ही मन पढ़ा जाय।

(5) बाईं हथेली पर जल रख कर दाहिने हाथ की पाँचों उंगलियाँ उसमें डुबोई जांय और क्रमशः मुख, नाक, आँख, कान, बाहु, जंघा इन पर बाईं और दाईं और जल का स्पर्श कराया जाता, यह न्यास है। न्यास के मंत्र याद न होने पर भी गायत्री का प्रयोग हो सकता है। यह शरीर मन और प्राण की शुद्धि के लिये किये जाने वाले पाँच प्रयोग हैं। इन्हें करने के बाद ही देव पूजन का कार्य आरंभ होता है।

स्नान मन्त्र,,,,

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥

देव पूजन में सबसे प्रथम धरती-माता का- मातृ-भूमिका, विश्व-वसुन्धरा का पूजन है। जिस धरती पर जिस देश समाज में जन्म लिया है वह प्रथम देव है, इसलिये इष्टदेव की पूजा से भी पहले पृथ्वी पूजन किया जाता है। पृथ्वी पर जल, अक्षत, चंदन, पुष्प रख कर पूजन करना चाहिये। पृथ्वी पूजन के मंत्र याद न हों तो गायत्री मंत्र का उच्चारण कर लेना चाहिये।

पृथ्वी क्षमा प्रार्थना,,,,

समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥

इसके बाद इष्टदेव का पूजन किया जाय-

नित्य पूजा विधि –

आह्वान, आमंत्रण के लिए अक्षत,स्नान के लिए जल,स्वागत के लिए चंदन अथवा रोली,सुगंध के लिए अगरबत्ती,सम्मान के लिए पुष्प,आहार के लिए नैवेद्य कोई फल मेवा या मिठाई
अभिवन्दन के लिए आरती कपूर अथवा दीपक की।

यह सात पूजा उपकरण सर्वसाधारण के लिए सरल हैं। पुष्प हर जगह- हर समय नहीं मिलते। उनके अभाव में केशर मिश्रित चन्दन से रंगे हुए चावल प्रयोग में लाये जा सकते हैं। प्रथम भगवान की पूजा स्थली पर विशेष रूप से आह्वान आमंत्रित करने के लिये हाथ जोड़कर अभिवन्दन करना चाहिये और उपस्थित का हर्ष व्यक्त करने के लिए माँगलिक अक्षतों (चावलों) की वर्षा करनी चाहिये।

इसके बाद जल, चंदन, अगरबत्ती, पुष्प, नैवेद्य, आरती की व्यवस्था करते हुए उनका स्वागत, सम्मान करना चाहिये। यह विश्वास करना चाहिये कि भगवान सामने उपस्थित हैं और हमारी पूजा प्रक्रिया को- भावनाओं को ग्रहण स्वीकार करेंगे। उपरोक्त सात पूजा उपकरणों के अलग-अलग मंत्र भी हैं। वे याद न हो सकें तो हर मंत्र की आवश्यकता गायत्री से पूरी हो सकती है। इस विधान के अनुसार इस एक ही महामंत्र से कभी पूजा प्रयोजन पूरे कर लेने चाहिये।

यहाँ प्रमुख ईश्वर और उनसे सम्बंधित मंत्रो को बताया गया है श्रद्धानुसार अपने इष्टदेव के मंत्र को भाव विभोर होकर बोलना चाहिए

गणपति स्तोत्र,,,,

गणपति: विघ्नराजो लम्बतुन्ड़ो गजानन:।
द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥
विनायक: चारूकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
द्वादश एतानि नामानि प्रात: उत्थाय य: पठेत्॥
विश्वम तस्य भवेद् वश्यम् न च विघ्नम् भवेत् क्वचित्।

विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।
लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं।
प्रसन्नवदनं ध्यायेतसर्वविघ्नोपशान्तये॥

आदिशक्ति वंदना,,,,,

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

शिव स्तुति,,,,,

कर्पूर गौरम करुणावतारं,
संसार सारं भुजगेन्द्र हारं।
सदा वसंतं हृदयार विन्दे,
भवं भवानी सहितं नमामि॥

विष्णु स्तुति,,,,

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

श्री कृष्ण स्तुति,,,,

कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम।
नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले, वेणु करे कंकणम॥
सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम, कंठे च मुक्तावलि।
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी॥

मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्‌।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्‌॥

श्रीराम वंदना,,,

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥

श्रीरामाष्टक,,,,

हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशवा।
गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा॥
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।
बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्॥

एक श्लोकी रामायण,,,,

आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि श्री रामायणम्॥

सरस्वती वंदना,,,,

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा माम पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्याऽपहा॥

हनुमान वंदना,,,

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्‌।
दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्‌।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥

इसके बाद जप का नम्बर आता है। मंत्र ऐसे उच्चारण करना चाहिये, जिससे कंठ, होठ और जीभ हिलते रहें। उच्चारण तो होता रहे पर इतना हल्का हो कि पास बैठा व्यक्ति भी उसे ठीक तरह से सुन समझ न सके। माला को प्रथम मस्तक पर लगाना चाहिये फिर उससे जप आरंभ करना चाहिये। तर्जनी उंगली का प्रयोग नहीं किया जाता, माला घुमाने में अंगूठा, मध्यमा और अनामिका इन तीनों का ही प्रयोग होता है। जब एक माला पूरी हो जाय तब सुमेरु (बीच का बड़ा दाना) उल्लंघन नहीं करते उसे लौट देते हैं।

अधिक रात गये जप करना हो तो मुँह बन्द करके- उच्चारण रहित मानसिक जप करते हैं। साधारणतया एक माला जप में 6 मिनट लगते हैं। पर अच्छा हो इस गति को और मंद करके 10 मिनट कर लिया जाय। दैनिक उपासना में- जब कि दो ही माला नित्य करनी हैं, गति में तेजी लाना ठीक नहीं। माला न हो तो उंगलियों पर 108 गिन कर एक माला पूरी होने की गणना की जा सकती है। घड़ी सामने रख कर भी समय का अनुमान लगाया जा सकता है।

और अंत में शांति पाठ अवश्य करना चाहिए ,,,,

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:,
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥

॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:

Monday, August 12, 2019

भोजन के बाद न करें ये काम

व्यायामं च व्यवायं च धावनं पानमेव च।युद्धं गीतं च पाठं च मुहुर्तं भुक्तवाँस्त्यजेत्।।
भोजन के पश्चात एक मुहुर्तभर ( लगभग पौन घंटा) व्यायाम, मैथुन, दौड़ना, जलपान, मल्लयुद्ध  ,गाना और पढना आदि कर्म नही करना चाहिए ।
भोजनोपरान्त लगभग एक घण्टे की समयावधि मे किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक श्रम पाचन प्रक्रिया में बाधा डालता है ।

Tuesday, May 14, 2019

असमंजस

असमंजस 

तुझे न देखू तो क्या देखू
तुझे देखलूं ,  तो क्या देखूं|
तू साथ न हो तो, बारात क्या हो
तू साथ हो, तो बारात क्या हो |
तू न हो तो सबसे क्या
तू हो तो सबसे क्या |
तू पास न हो तो क्या मेला
तू पास हो गर तो क्या मेला|
तुझे न सोचूं तो क्या सोचूं
तुझे सोचूं तो क्या सोचूं|

                  -अवनीश द्विवेदी 


Thursday, May 2, 2019

शुभ अशुभ संकेत ! शुभ-अशुभ शकुन विचार

!! शुभ अशुभ संकेत ! शुभ-अशुभ शकुन विचार !!

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शगुन और अपशगुन को सदियो से माना जाता रहा है। मनुष्य के जीवन में होने वाले अच्छे बुरे या होनी अनहोनी की पूर्व जानकारी प्रकृति विभिन्न माध्यम से दे देती है। शुभ और अशुभ संकेतों में विश्वास हमेशा से मानव सोच का एक हिस्सा रहे है।

हम में से कई शुभ और अशुभ संकेतों को अच्छे भाग्य और विपत्ति के लक्षण के रूप में विश्वास करते हैं। लोग शुभ और अशुभ दिनों, पक्षियों ,जानवरों आदि में विश्वास करते है। ऐसे ही कुछ प्रमुख शकुन एवं अपशकुन की जानकारी आपको यहाँ दे रहे हैं लेकिन इन्हें प्रयोग में लाने से पहले किसी विवाद में न पड़ कर खुद समय आने पर इनका निरीक्षण परीक्षण कर सकते हैं।

 जानें क्या है शुभ और क्या अशुभ !!

अगर घर में बिल्ली बच्चे को जन्म देती है तो यह शुभ संकेत है , जिससे जल्दी ही धन संपदा की प्राप्ति होगी, ऐसे कई संकेत प्रकृति हमारे सामने हमेशा रखती है, लेकिन, लोग जानकारी के आभाव में समझ नहीं पाते है। यह कुदरत का नियम है कि जो भी शुभ या अशुभ होना है, उसकी पूर्व सुचना मनुष्य को ऐसे ही संकेतों से मिलती है।

पहले के ऋषि मुनि चिन्तक और आत्म दर्शी होते है। और वह मानव जीवन की, प्रकृति परिवर्तन की, पशु-पक्षियों के व्यवहार, बोली अथवा बार बार होने वाली घटनाओं का अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषण कर सकते है। वृहत संहिता में एक सम्पूर्ण अध्याय इसी विषय पर लिखा गया है।

गाय अचानक गाय घर के दरवाजे के अंदर आकार रम्भाना शुरू कर दें तो, यह संकेत सुख सौभाग्य का सूचक है।

यदि आपके घर के आँगन में बन्दर आम की गुठली कहीं से लाकर डाल दे तो, यह संकेत आपके व्यापार में लाभ होने का सूचक होता है।

जिस घर के दरवाजे पर आकर गाय जोर-जोर से रंभाए तो निश्चय ही उस घर के सुख में वृद्धि होती है।

कौवा आपके घर के मुख्य द्वार के पास यदि कौवा सुबह सुबह बोलता है तो समझ लीजिए कि आज आपके घर कोई आने वाला है। यदि दोपहर को बोलता है तो कोई पत्र या अतिथि आपसे मिलने आएगा।

यदि तीतर घर के दक्षिण दिशा में आवाज करता है तो अचानक सुख सौभाग्य और धन प्राप्ति का योग बनता है।

आपके घर में यदि कोई भी पक्षी चांदी का टुकड़ा या चांदी की अन्य चीज ला कर डाल देता है तो आपको कहीं से अचानक लक्ष्मी की प्राप्ति होगी।

आपके घर की मुंडेर या चार दीवारी पर यदि कोयल या सोन चिड़िया बैठ कर मधुर स्वर करती है तो घर के स्वामी का भाग्योदय होता है तथा सुखी जीवन का प्रतीक संकेत है।

जिस घर की छत या मुंडेर पर कोयल या सोन चिरैय्या चहचहाए, वहां निश्चित ही धन की वृद्धि होती है।

काली चींटियों का घर की छत या दीवार पर घूमना या रेंगना घर की उन्नति के लिए शुभ संकेत माना जाता है। जिस घर में काली चींटियां समूह में घूमती हों वहां ऐश्वर्य वृद्धि होती है, किन्तु मतभेद भी होते हैं।

हाथी यदि आपके घर के मुख्य द्वार के सामने अचानक हाथी आ कर अपनी सूंड उठा कर जोर से स्वर करता है तो वाद विवाद में आपकी जीत होती है और मुकद्दमा आपके पक्ष में होता चला जायगा। जिस घर के द्वार पर हाथी अपनी सूंड ऊंची करे वहां उन्नति, वृद्धि तथा मंगल होने की सूचना मिलती है।

यदि आपके घर की किसी भी दीवार पर सफेद पंक्षी बैठ कर आवाज करता है तो यह संकेत आपकी व्यापार वृद्धि में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।

बिल्ली यदि घर में, छत या किसी कमरें में बिल्ली प्रसव करती है तो समझ लीजिए कि धन संपदा की वृद्धि होने वाली है।

जिस घर में प्राय: बिल्लियां आकर मल त्याग कर जाती हैं, वहां कुछ शुभत्व के लक्षण प्रकट होते हैं।

जिस भवन में बिल्लियां प्राय: लड़ती रहती हैं तो यह शुभ नहीं होता है। वहां शीघ्र ही विघटन की संभावना रहती है विवाद वृद्धि होती है। मतभेद होता है।

कुत्ता घर के सामने की ओर मुख करके कोई कुत्ता रोए तो निश्चय ही घर में कोई विपत्ति आने वाली है अथवा किसी की मृत्यु होने वाली है।

कबूतर घर में प्राकृतिक रूप से कबूतरों का वास शुभ होता है।

मकड़ी के जाले घर में मकड़ी के जाले का होना शुभ नहीं होता हैं।

मोर घर की सीमा में मोर का रहना या आना शुभ होता है।

बिच्छू जिस घर में बिच्छू कतार बना कर बाहर जाते हुए दिखाई दें तो समझ लेना चाहिए कि वहां से लक्ष्मी जाने की तैयारी कर रही हैं। पीला बिच्छू माया का प्रतीक है। पीला बिच्छू घर में निकले तो घर में लक्ष्मी का आगमन होता है।

चमगादड़ घर में चमगादड़ों का वास अशुभ होता है।

छछूंदर जिस भवन में छछूंदरें घूमती हैं वहां लक्ष्मी की वृद्धि होती है।

काले चूहे जिस घर में काले चूहों की संख्या अधिक हो जाती है वहां किसी व्याधि के अचानक होने का अंदेशा रहता है।

आर्थिक या जीवनयापन में आने वाली सभी अड़चनों को दूर कर सकते है यह सफलता के उपाय

शुभ शकुन.....

यदि आपके सामने सुहागन स्त्री अथवा गाय आ जाए। और आप किसी कार्य से जा रहे हैं तो कार्य में सफलता मिलती है।

 कही जाते समय यदि आप कपड़े पहन रहे हैं और जेब से पैसे गिरें तो धन प्राप्ति का संकेत है। इसके विपरीत कपड़े उतारते समय भी ऐसा हो तो भी शुभ होता है।

आप सोकर उठे हों और कोई भिखारी माँगने आ जाए तो ये समझना चाहिए आपके द्वारा दिया गया पैसा (उधार) बिना माँगे वापस आ जाएगा।

सोकर उठते ही नेवला आपको दिख जाए तो गुप्त धन मिलने की संभावना रहती है।

किसी काम के लिए जाते समय आपके सामने कोई भी व्यक्ति गुड़ ले जाता हुआ दिखे तो आशा से अधिक लाभ होता है।

आप लड़की के लिए वर तलाश करने जा रहे हों। घर से निकलते समय चार कुँवारी लड़कियाँ बातचीत करते मिल जाएँ तो शुभ योग होता है।
यदि शरीर पर चिड़िया गंदगी कर दे तो आपने समझना चाहिए आपकी दरिद्रता दूर होने वाली है। ये शुभ शकुन हैं।

रामचरितमानस में वर्णित कुछ शुभ संकेत।

चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई॥

भावार्थ:-  सुंदर शुभदायक शकुन हो रहे हैं। नीलकंठ पक्षी बाईं ओर चारा ले रहा है, मानो सम्पूर्ण मंगलों की सूचना दे रहा हो॥।

दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा॥
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सबाल आव बर नारी॥

भावार्थ:-दाहिनी ओर कौआ सुंदर खेत में शोभा पा रहा है। नेवले का दर्शन भी सब किसी ने पाया। तीनों प्रकार की (शीतल, मंद, सुगंधित) हवा अनुकूल दिशा में चल रही है। श्रेष्ठ (सुहागिनी) स्त्रियाँ भरे हुए घड़े और गोद में बालक लिए आ रही हैं॥

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा॥
मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई॥

भावार्थ:-लोमड़ी फिर-फिरकर (बार-बार) दिखाई दे जाती है। गायें सामने खड़ी बछड़ों को दूध पिलाती हैं। हरिनों की टोली (बाईं ओर से) घूमकर दाहिनी ओर को आई, मानो सभी मंगलों का समूह दिखाई दिया॥

छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी॥
सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना॥

भावार्थ:-क्षेमकरी (सफेद सिरवाली चील) विशेष रूप से क्षेम (कल्याण) कह रही है। श्यामा बाईं ओर सुंदर पेड़ पर दिखाई पड़ी। दही, मछली और दो विद्वान ब्राह्मण हाथ में पुस्तक लिए हुए सामने आए॥

मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार॥

भावार्थ:-सभी मंगलमय, कल्याणमय और मनोवांछित फल देने वाले शकुन मानो सच्चे होने के लिए एक ही साथ हो गए॥
जय रामजी की //

तुम्हारी जुदाई पर मेरी आँखों में आंसू ही नहीं आये

तुम्हारी जुदाई पर
मेरी आँखों में आंसू ही नहीं आये|
आंसू आते भी तो कैसे ,
दिमाग तो मान रहा था कि तुम जुदा हो गए
परंतु दिल मानने तो तैयार नहीं था |
मानता भी तो कैसे
तुम मुझसे जुदा हो गए यह महज भ्रम है तुम्हारा|
मुझको तुम खुद से जुदा चाहकर भी नहीं कर सकते |
मैं हरदम तुम्हारे साथ रहूंगा
कभी जब तुम अकेले में अपनी पुरानी किताबों को पलटोगे ,
तो  वो पाठ जो तुमने सबसे अच्छी तरह पढा होगा मैं वो पाठ हूं |
जिस टॉपिक को समझने की तुमने बड़ी रूचि से कोशिश की थी कभी उस टॉपिक के रूप में मिलूगा|
जो लाइने तुमने बड़ी चाहत से याद की होंगी उस याद के रूप में मिलूगा|

Saturday, April 20, 2019

अगर आप का भी पैसा पी ए सी एल (PACL) में फंसा है तो जरूर पढ़े

अंतिम तिथि: दावे के आवेदन प्राप्त करने की अंतिम तिथि 30 अप्रैल, 2019 है

सरकारी वेबसाइट: PACL निवेशक वेबसाइट https://www.sebipaclrefund.co.in/ पर पहुंच सकते हैं

मूल प्रमाण पत्र: सेबी ने निवेशकों को समिति से प्राप्त विशिष्ट सूचना के बिना अपने मूल पीएसीएल पंजीकरण प्रमाणपत्रों के साथ साझेदारी के खिलाफ चेतावनी दी है। संक्षेप में, किसी को भी मूल प्रमाण पत्र न दें।

हेल्पलाइन नंबर: प्रश्नों / शिकायतों के मामले में, PACL निवेशक हेल्पलाइन नंबर 022-61216966 पर संपर्क कर सकते हैं

दस्तावेजों की पूरी सूची: यहां PACL रिफंड क्लेम आवेदन पत्र ऑनलाइन भरने के लिए आवश्यक दस्तावेजों और जानकारी की पूरी सूची है:

जानकारी चाहिए:-
- आपको पीएसीएल प्रमाणपत्र के अनुसार अपना नाम जमा करना होगा
- दावा राशि (रु। में)
- पैन के अनुसार नाम
- पैन नंबर
-आपका बैंक खाता नंबर
- बैंक का नाम और IFSC कोड।

अपलोड करने के लिए आवश्यक दस्तावेज: -
-अपने पैन की कॉपी
-सबसे ज्यादा पासपोर्ट साइज फोटो
बैंक के लेटर हेड पर sebipaclrefund.co.in पर उपलब्ध निर्धारित प्रारूप के अनुसार अपने नाम छपे हुए या बैंकर के प्रमाणपत्र के साथ रद्द चेक की कॉपी।
-पीएसीएल प्रमाण पत्र की प्रति, और प्राप्तियों, यदि कोई हो।

इससे पहले, पैनल ने पीएसीएल निवेशकों से दावा आवेदनों की प्राप्ति की प्रक्रिया शुरू की थी, जिनकी कुल बकाया राशि 2,500 रुपये तक थी। प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। सत्यापन के बाद, आदेश में पाए जाने वाले दावों के संबंध में धनवापसी की गई और प्रक्रिया पूरी हो गई है।

समिति ने अब PACL लिमिटेड के साथ बकाया दावों वाले सभी निवेशकों से दावे प्राप्त करने का निर्णय लिया है।

Thursday, March 14, 2019

अजीम प्रेम जी ने किया बहुत बड़ा दान

भारतीय समूह विप्रो लिमिटेड के अरबपति चेयरमैन अजीम प्रेमजी, परोपकारी गतिविधियों का समर्थन करने के लिए 7.5 बिलियन डॉलर की कंपनी में 34 प्रतिशत शेयर देंगे, जो भारतीय इतिहास में सबसे उदार दान है।
फाउंडेशन द्वारा प्रेमजी द्वारा नियंत्रित शेयरों को अपरिवर्तनीय रूप से त्याग दिया गया है और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के लिए रखा गया है, फाउंडेशन ने बुधवार को एक बयान में कहा।
"इस कार्रवाई के साथ, श्री प्रेमजी द्वारा योगदान किए गए परोपकारी एंडॉवमेंट कॉर्पस का कुल मूल्य $ 21 बिलियन है, जिसमें विप्रो के आर्थिक स्वामित्व का 67% शामिल है।"
उनकी नींव शिक्षा में सीधे काम करती है और बहु-वर्षीय वित्तीय अनुदान के माध्यम से कम-विशेषाधिकार प्राप्त और हाशिए पर रहने वाले 150 से अधिक गैर-लाभकारी संगठनों का समर्थन करती है। फाउंडेशन ने शिक्षा और संबंधित मानव विकास डोमेन में पेशेवरों को विकसित करने, डिग्री और शिक्षा कार्यक्रमों की पेशकश करने और अनुसंधान का संचालन करने के लिए अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्थापना की।
बयान में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में यह आधार काफी महत्वपूर्ण हो जाएगा। शिक्षा में काम करने वाली टीम मौजूदा 1,600 लोगों से बढ़ेगी और अनुदान देने वाली गतिविधियाँ तिगुनी हो जाएँगी। बेंगलुरु स्थित विश्वविद्यालय 400 से अधिक संकाय सदस्यों के साथ 5,000 छात्रों का विस्तार करेगा। यह फाउंडेशन उत्तर भारत में एक और विश्वविद्यालय स्थापित करने का इरादा रखता है।
अल्ट्रा-अमीर भारतीय, जिनकी कुल संपत्ति $ 50 मिलियन से अधिक है, वे पांच साल पहले की तुलना में कम धर्मार्थ हैं, मिंट अखबार ने पिछले हफ्ते रिपोर्ट की थी, जिसमें प्रेमजी अपवाद थे। बेंगलुरु के 73 वर्षीय अरबपति भारत के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति हैं और ब्लूमबर्ग की वैश्विक अरबपतियों की सूची में 51 वें स्थान पर हैं।

Sunday, March 10, 2019

आदर्श आचार संहिता' लागू, जानिए इसके बारे में सब कुछ

लोकसभा चुनावों के एलान के साथ ही 'आदर्श आचार संहिता' लागू, जानिए इसके बारे में सब कुछ*👇

लोकसभा चुनाव का एलान हो चुका है। और इसी के साथ लागू हो गई है आदर्श आचार संहिता। इस चुनावी माहौल में आपके लिए जरूरी है कि आप चुनाव के तमाम नियमों से अपडेट रहें। भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत पारदर्शी चुनावों के सफल आयोजन की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होती है। इसलिए चुनाव आयोग 'चुनाव आचार संहिता' लागू करता है जिसका पालन चुनाव खत्म होने तक हर पार्टी और उसके उम्मीदवार को करना होता है।

*चुनाव आचार संहिता : क्या, क्यों और कैसे?*

देश में होने वाले सभी चुनावों से पहले चुनाव आयोग आचार संहिता (Code of Conduct) लगाता है। इस दौरान राजनीतिक दलों, उनके उम्मीदवारों और आम जनता को सख्त नियमों का पालन करना होता है। अगर कोई उम्मीदवार इन नियमों का पालन नहीं करता तो चुनाव आयोग उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। उसे चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है और  उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की जा सकती है।

*सामान्य नियम:*

* कोई भी दल ऐसा काम न करे, जिससे जातियों और धार्मिक या भाषाई समुदायों के बीच मतभेद बढ़े या घृणा फैले।
* राजनीतिक दलों की आलोचना कार्यक्रम व नीतियों तक सीमित हो, न कि व्यक्तिगत।
* धार्मिक स्थानों का उपयोग चुनाव प्रचार के मंच के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
* मत पाने के लिए भ्रष्ट आचरण का उपयोग न करें। जैसे-रिश्वत देना, मतदाताओं को परेशान करना आदि।
* किसी की अनुमति के बिना उसकी दीवार, अहाते या भूमि का उपयोग न करें।
* किसी दल की सभा या जुलूस में बाधा न डालें।
* राजनीतिक दल ऐसी कोई भी अपील जारी नहीं करेंगे, जिससे किसी की धार्मिक या जातीय भावनाएं आहत होती हों।

*राजनीतिक सभाओं से जुड़े नियम :*

* सभा के स्थान व समय की पूर्व सूचना पुलिस अधिकारियों को दी जाए।
* दल या अभ्यर्थी पहले ही सुनिश्चित कर लें कि जो स्थान उन्होंने चुना है, वहॉं निषेधाज्ञा तो लागू नहीं है।
* सभा स्थल में लाउडस्पीकर के उपयोग की अनुमति पहले प्राप्त करें।
* सभा के आयोजक विघ्न डालने वालों से निपटने के लिए पुलिस की सहायता करें।



*कुछ और नियम*

*जुलूस संबंधी नियम :*

* जुलूस का समय, शुरू होने का स्थान, मार्ग और समाप्ति का समय तय कर सूचना पुलिस को दें।
* जुलूस का इंतजाम ऐसा हो, जिससे यातायात प्रभावित न हो।
* राजनीतिक दलों का एक ही दिन, एक ही रास्ते से जुलूस निकालने का प्रस्ताव हो तो समय को लेकर पहले बात कर लें।
* जुलूस सड़क के दायीं ओर से निकाला जाए।
* जुलूस में ऐसी चीजों का प्रयोग न करें, जिनका दुरुपयोग उत्तेजना के क्षणों में हो सके।

*मतदान के दिन संबंधी नियम :*

* अधिकृत कार्यकर्ताओं को बिल्ले या पहचान पत्र दें।
* मतदाताओं को दी जाने वाली पर्ची सादे कागज पर हो और उसमें प्रतीक चिह्न, अभ्यर्थी या दल का नाम न हो।
* मतदान के दिन और इसके 24 घंटे पहले किसी को शराब वितरित न की जाए।
* मतदान केन्द्र के पास लगाए जाने वाले कैम्पों में भीड़ न लगाएं।
* कैम्प साधारण होने चाहिए।
* मतदान के दिन वाहन चलाने पर उसका परमिट प्राप्त करें।

*सत्ताधारी दल के लिए नियम :*

* कार्यकलापों में शिकायत का मौका न दें।
* मंत्री शासकीय दौरों के दौरान चुनाव प्रचार के कार्य न करें।
* इस काम में शासकीय मशीनरी तथा कर्मचारियों का इस्तेमाल न करें।
* सरकारी विमान और गाड़ियों का प्रयोग दल के हितों को बढ़ावा देने के लिए न हो।
* हेलीपेड पर एकाधिकार न जताएं।

Sunday, March 3, 2019

बारह महाजन

स्वयम्भुर्नारद:शम्भु कुमार: कपिलोमनु: 

प्रह्लादोजनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम। 

ये12 महाजन हैं-स्वयंभू, शंभु, नारद, सनत कुमार, कपिल, मनु, जनक, भीष्म, बली, व्यास जी, प्रह्लाद और यमराज। 

Thursday, January 24, 2019

गरुड़ पुराण में वर्णित नरक

गरुड़ पुराण में वर्णन है 36 नर्क का, जानिए किसमें कैसे दी जाती है सजा
हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखी अनेक कथाओं में स्वर्ग और नर्क के बारे में बताया गया है। पुराणों के अनुसार स्वर्ग वह स्थान होता है जहां देवता रहते हैं और अच्छे कर्म करने वाले इंसान की आत्मा को भी वहां स्थान मिलता है, इसके विपरीत बुरे काम करने वाले लोगों को नर्क भेजा जाता है, जहां उन्हें सजा के तौर पर गर्म तेल में तला जाता है और अंगारों पर सुलाया जाता है।
यह भी पढ़े- गरुड़ पुराण- इन 5 कामों से कम होती है उम्र
हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण, कठोपनिषद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। आज हम आपको उन नर्कों के बारे में संक्षिप्त रूप से बता रहे हैं-
1. महावीचि- यह नर्क पूरी तरह रक्त यानी खून से भरा है और इसमें लोहे के बड़े-बड़े कांटे हैं। जो लोग गाय की हत्या करते हैं, उन्हें इस नर्क में यातना भुगतनी पड़ती है।
2. कुंभीपाक- इस नर्क की जमीन गरम बालू और अंगारों से भरी है। जो लोग किसी की भूमि हड़पते हैं या ब्राह्मण की हत्या करते हैं। उन्हें इस नर्क में आना पड़ता है।
3. रौरव- यहां लोहे के जलते हुए तीर होते हैं। जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इन तीरों से बींधा जाता है।
4. मंजूष- यह जलते हुए लोहे जैसी धरती वाला नर्क है। यहां उनको सजा मिलती है, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं या कैद में रखते हैं।
5. अप्रतिष्ठ- यह पीब, मूत्र और उल्टी से भरा नर्क है। यहां वे लोग यातना पाते हैं, जो ब्राह्मणों को पीड़ा देते हैं या सताते हैं।
6. विलेपक- यह लाख की आग से जलने वाला नर्क है। यहां उन ब्राह्मणों को जलाया जाता है, जो शराब पीते हैं।
7. महाप्रभ- इस नर्क में एक बहुत बड़ा लोहे का नुकीला तीर है। जो लोग पति-पत्नी में फूट डालते हैं, पति-पत्नी के रिश्ते तुड़वाते हैं वे यहां इस तीर में पिरोए जाते हैं।
8. जयंती- यहां जीवात्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। जो लोग पराई औरतों के साथ संभोग करते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
9. शाल्मलि- यह जलते हुए कांटों से भरा नर्क है। जो औरत कई पुरुषों से संभोग करती है व जो व्यक्ति हमेशा झूठ व कड़वा बोलता है, दूसरों के धन और स्त्री पर नजर डालता है। पुत्रवधू, पुत्री, बहन आदि से शारीरिक संबंध बनाता है व वृद्ध की हत्या करता है, ऐसे लोगों को यहां लाया जाता है।
10. महारौरव- इस नर्क में चारों तरफ आग ही आग होती है। जैसे किसी भट्टी में होती है। जो लोग दूसरों के घर, खेत, खलिहान या गोदाम में आग लगाते हैं, उन्हें यहां जलाया जाता है।
11. तामिस्र- इस नर्क में लोहे की पट्टियों और मुग्दरों से पिटाई की जाती है। यहां चोरों को यातना मिलती है।
12. महातामिस्र- इस नर्क में जौंके भरी हुई हैं, जो इंसान का रक्त चूसती हैं। माता, पिता और मित्र की हत्या करने वाले को इस नर्क में जाना पड़ता है।
13. असिपत्रवन- यह नर्क एक जंगल की तरह है, जिसके पेड़ों पर पत्तों की जगह तीखी तलवारें और खड्ग हैं। मित्रों से दगा करने वाला इंसान इस नर्क में गिराया जाता है।
14. करम्भ बालुका- यह नर्क एक कुएं की तरह है, जिसमें गर्म बालू रेत और अंगारे भरे हुए हैं। जो लोग दूसरे जीवों को जलाते हैं, वे इस कुएं में गिराए जाते हैं।
15. काकोल- यह पीब और कीड़ों से भरा नर्क है। जो लोग छुप-छुप कर अकेले ही मिठाई खाते हैं, दूसरों को नहीं देते, वे इस नर्क में लाए जाते हैं।
16. कुड्मल- यह मूत्र, पीब और विष्ठा (उल्टी) से भरा है। जो लोग दैनिक जीवन में पंचयज्ञों ( ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) का अनुष्ठान नहीं करते वे इस नर्क में आते हैं।
17. महाभीम- यह नर्क बदबूदार मांस और रक्त से भरा है। जो लोग ऐसी चीजें खाते हैं, जिनका शास्त्रों ने निषेध बताया है, वो लोग इस नर्क में गिरते हैं।
18. महावट- इस नर्क में मुर्दे और कीड़े भरे हैं, जो लोग अपनी लड़कियों को बेचते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
19. तिलपाक- यहां दूसरों को सताने, पीड़ा देने वाले लोगों को तिल की तरह पेरा जाता है। जैसे तिल का तेल निकाला जाता है, ठीक उसी तरह।
20. तैलपाक- इस नर्क में खौलता हुआ तेल भरा है। जो लोग मित्रों या शरणागतों की हत्या करते हैं, वे यहां इस तेल में तले जाते हैं।
21. वज्रकपाट- यहां वज्रों की पूरी श्रंखला बनी है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते हैं, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं।
22. निरुच्छवास- इस नर्क में अंधेरा है, यहां वायु नहीं होती। जो लोग दिए जा रहे दान में विघ्न डालते हैं वे यहां फेंके जाते हैं।
23. अंगारोपच्य- यह नर्क अंगारों से भरा है। जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं। वे यहां जलाए जाते हैं।
24. महापायी- यह नर्क हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य बोलने वाले यहां औंधे मुंह गिराए जाते हैं।
25. महाज्वाल- इस नर्क में हर तरफ आग है। जो लोग हमेशा ही पाप में लगे रहते हैं वे इसमें जलाए जाते हैं।
26. गुड़पाक- यहां चारों ओर गरम गुड़ के कुंड हैं। जो लोग समाज में वर्ण संकरता फैलाते हैं, वे इस गुड़ में पकाए जाते हैं।
27. क्रकच- इस नर्क में तीखे आरे लगे हैं। जो लोग ऐसी महिलाओं से संभोग करते हैं, जिसके लिए शास्त्रों ने निषेध किया है, वे लोग इन्हीं आरों से चीरे जाते हैं।
28. क्षुरधार- यह नर्क तीखे उस्तरों से भरा है। ब्राह्मणों की भूमि हड़पने वाले यहां काटे जाते हैं।
29. अम्बरीष- यहां प्रलय अग्रि के समान आग जलती है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।
30. वज्रकुठार- यह नर्क वज्रों से भरा है। जो लोग पेड़ काटते हैं वे यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।
31. परिताप- यह नर्क भी आग से जल रहा है। जो लोग दूसरों को जहर देते हैं या मधु (शहद) की चोरी करते हैं, वे यहां जलाए जाते हैं।
32. काल सूत्र- यह वज्र के समान सूत से बना है। जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं। वे यहां सजा पाते हैं।
33. कश्मल- यह नर्क नाक और मुंह की गंदगी से भरा होता है। जो लोग मांसाहार में ज्यादा रुचि रखते हैं, वे यहां गिराए जाते हैं।
34. उग्रगंध- यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नर्क है। जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते, वे यहां लाए जाते हैं।
35. दुर्धर- यह नर्क जौक और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नर्क में भेजे जाते हैं।
36. वज्रमहापीड- यहां लोहे के भारी वज्र से मारा जाता है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, किसी प्राणी की हत्या कर उसे खाते हैं, दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्र चुराते हैं, जो दूसरों के फल चुराते हैं, धर्म को नहीं मानते ऐसे सारे लोग यहां लाए जाते हैं।
नमः शिवाय

Wednesday, January 23, 2019

माघ स्नान की महिमा

.                       "माघ स्नान माहात्म्य"


          'पद्म पुराण' के उत्तर खण्ड में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि व्रत, दान व तपस्या से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में ब्राह्ममुहूर्त में उठकर स्नानमात्र से होती है।

               व्रतैर्दानस्तपोभिश्च  न  तथा  प्रीयते  हरिः।
               माघमज्जनमात्रेण यथा प्रीणाति केशवः।।

          अतः सभी पापों से मुक्ति व भगवान की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान व्रत करना चाहिए। इसका प्रारम्भ पौष की पूर्णिमा से होता है।
          माघ मास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहाँ कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है। इस मास की प्रत्येक तिथि पर्व हैं। कदाचित् अशक्तावस्था में पूरे मास का नियम न ले सकें तो शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था की है तीन दिन अथवा एक दिन अवश्य माघ-स्नान व्रत का पालन करें। इस मास में स्नान, दान, उपवास और भगवत्पूजा अत्यन्त फलदायी है।
          माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'षटतिला एकादशी' के नाम से जानी जाती है। इस दिन काले तिल तथा काली गाय के दान का भी बड़ा माहात्म्य है।
1. तिल मिश्रित जल से स्नान, 2. तिल का उबटन, 3. तिल से हवन, 4. तिलमिश्रित जल का पान व तर्पण, 5. तिलमिश्रित भोजन, 6. तिल का दान। ये छः कर्म पाप का नाश करने वाले हैं।
          माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या 'मौनी अमावस्या' के रूप में प्रसिद्ध है। इस पवित्र तिथि पर मौन रहकर अथवा मुनियों के समान आचरणपूर्वक स्नान दान करने का विशेष महत्त्व है।
          अमावस्या के दिन (04 फरवरी) सोमवार का योग होने पर उस दिन देवताओं को भी दुर्लभ हो ऐसा पुण्यकाल होता है, क्योंकि गंगा, पुष्कर एवं दिव्य अंतरिक्ष और भूमि के जो सब तीर्थ हैं, वे 'सोमवती (दर्श) अमावस्या' के दिन के जप, ध्यान, पूजन करने पर विशेष धर्मलाभ प्रदान करते हैं।
          मंगलवारी चतुर्थी, रविवारी सप्तमी, बुधवारी अष्टमी, सोमवारी अमावस्या, ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं। इनमें किया गया स्नान, दान व श्राद्ध अक्षय होता है।
          माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् 'वसंत पंचमी' को माँ सरस्वती का आविर्भाव-दिवस माना जाता है। इस दिन (10 फरवरी) प्रातः सरस्वती-पूजन करना चाहिए। पुस्तक और लेखनी (कलम) में भी देवी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है, अतः उनकी भी पूजा की जाती है।
          शुक्ल पक्ष की सप्तमी को 'अचला सप्तमी' कहते हैं। षष्ठी के दिन एक बार भोजन करके सप्तमी (12 फऱवरी) को सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से पापनाश, रूप, सुख-सौभाग्य और सदगति प्राप्त होती है।
          ऐसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है, तथापि उनमें भी माघी पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। इस दिन (19 फरवरी) स्नानादि से निवृत्त होकर भगवत्पूजन, श्राद्ध तथा दान करने का विशेष फल है। जो इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर भगवान विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है।
          माघी पूर्णिमा के दिन तिल, सूती कपड़े, कम्बल, रत्न, पगड़ी, जूते आदि का अपने वैभव के अनुसार दान करके मनुष्य स्वर्गलोक में सुखी होता है। 'मत्स्य पुराण' के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है

Sunday, January 20, 2019

माँ

मां एक ऐसा शब्द जो कि अपने आप में परिपूर्ण शब्द है |मां हमारे अस्तित्व का मूल कारण है |मां हमारी पैदाइश में भगवान की साझेदार है |हमने भगवान को नही देखा है न ही छुआ है परंतु अगर भगवान मिलते तो शायद मां के जैसा ही व्यवहार करते|जब एक बच्चा पैदा होता है तो वह रोने के अलावा कुछ नहीं जानता|मां उसे धीरे धीरे हर चीज़ सिखाती है |जब एक मां गर्भ धारण करती है तो वह केवल नये प्राणी को अस्तित्व में लाने का प्रयास ही नहीं करती अपितु वह अपने शरीर  का भी बलिदान करती है |गर्भ में बच्चा मां से रक्त, मांस, विचार और व्यवहार लेता है |जब कोई स्त्री गर्भवती होती है तो उसे अनेक प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं जो कि दुनियां का कोई भी पुरुष नही सह सकता |फिर भी मां हसते हसते सब सहकर नये प्राणी को अस्तित्व में लाती है |संसार में जितने भी जीव हैं सब किसी न किसी मां की कोख से ही जन्म प्राप्त करते हैं |बिना मां के किसी का जन्म संभव ही नहीं है |जब एक जीव जन्म लेताहै तो उसे रोने के सिवा कुछ भी नहीं आता है |मां अपने नवजात शिशु की हर आवश्यकता का खयाल रखती है |बच्चा बोल नहीं पाता कि उसे क्या चाहिये पर मां समझ जाती है |बच्चे की भूख, प्यास, तकलीफ सब मां तुरंत समझ जाती है |बच्चा कब क्या चाहता है यह बात केवल मां समझती है |जो वात्सल्य हमें मां की गोंद में मिलता है धरती पर कहीं नही मिल सकता |हमारे धर्मग्रंथों में भी मां के महत्व को सर्वोपरि बताया गया है |हमारे धर्मग्रंथ बताते हैं कि मां प्रथम गुरू है, मां भगवान है, मां की सेवा से सम्पूर्ण देवी देवता की सेवा का फल प्राप्त हो जाता है |
दुनिया में कोई आपकी मुस्कान के लिए अपनी कुर्बानी दे सकता है तो वह केवल मां है |
दुनियां केवल मां ही है जो आपके हर अपराध को क्षमा कर देती है |
दुनिया में मां ही है जो तुम्हारी खुशी के लिए अपनी जिंदगी तक की कुर्बानी हंसकर दे देती है |
आजकल विशेषरूप से शहरों में वृद्धाश्रम की भरमार हो गयी है | वृद्धाश्रम हमारी सभ्यता पर कलंक है |जिससे हमें रूप रंग तन मन धन जीवन आचार विचार व्यवहार स्वभाव प्रभाव मिला हमारे घरों में उनकी ही जगह न रही|जिस मां ठंड गरम की परवाह किये बिना तुम्हें दुलारों से पाला उसके तुम वृद्धाश्रम छोड़ आये |मां को त्यागने वालों उसके दूध से जो तुम्हारा पोषण हुआ उसे कैसे त्याग सकते हो |जिसने तुम्हें पलकों पर रखा तुम उसे वृद्धाश्रम में रखते हो|
जिसने अपनी माँ के चरणों में प्रणाम कर लिया उसे किसी मंदिर में जाने की जरूरत नहीं है |मां की गोद का सुख लेने के लिए हमारा भगवान गोकुल में पैदा होता है |दुनियां में मां की गोंद से पवित्र कोई जगह नहीं है |धरती पर मां के चरणों से पूजनीय दूसरी जगह नहीं है |मां के हाथों के कोमल स्पर्श से बढकर कोई सुख नहीं है |मां की सिखाई बातों से बढकर कोई शिक्षा नहीं है |
मां से बढकर कोई गुरू नहीं है |मां इतना कुछ हमे देती है और बदले में कुछ भी नहीं चाहती | जिसकी दुआ केवल हमारे लिए होती है |
कैसी विडम्बना है कि लोग लड़की के प्यार में पागल होकर आत्महत्या कर लेते हैं परंतु मां के लिए जरा सा कष्ट नहीं उठा सकते|बड़े भाग्यवान हैं वो लोग जिन्हें मां मिली मां का प्यार मिला |वे सभी लोग जिनकी मां है अपनी माँ को सम्मान दें प्यार दे भगवान उनका विशेष खयाल रखेगा |
जय हिंद जय भारत जय श्री राम |

Wednesday, January 16, 2019

पारिजात वृक्ष

!!! पारिजात वृक्ष : इस वृक्ष के कारण हुआ था इंद्र और कृष्ण में युद्ध !!!

पारिजात वृक्ष तो पुरे भारत में पाये जाते है, लेकिन किंटूर में पाया जाने वाला यह पारिजात वृक्ष अपने आप कई विशेषताए रखता है और यह अपनी तरह का पुरे भारत में इकलौता पारिजात वृक्ष है।

उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिला मुख्यालय से ३८ किलोमीटर कि दूरी पर किंटूर गाँव है।

इस जगह का नामकरण पाण्डवों कि माता कुन्ती के नाम पर हुआ है। यहाँ पर पाण्डवों ने माता कुन्ती के साथ अपना अज्ञातवास बिताया था।

इसी किंटूर गाँव में भारत का एक मात्र पारिजात का पेड़ पाया जाता है। कहते है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से सारी थकान मिट जाती है |

*** पारिजात वृक्ष के बारे में -

आमतौर पर पारिजात वृक्ष १० फीट  से २५ फीट तक ऊंचे होता है, पर किंटूर में स्तिथ पारिजात वृक्ष लगभग ४५ फीट ऊंचा और ५० फीट मोटा है।

इस पारिजात वृक्ष कि सबसे बड़ी विशेषता यह है कि, यह अपनी तरह का  इकलौता पारिजात वृक्ष है, क्योंकि इस पारिजात वृक्ष पर बीज नहीं लगते है तथा इस पारिजात वृक्ष कि कलम बोने से भी दूसरा वृक्ष तैयार नहीं होता है।

पारिजात वृक्ष  पर जून के आस पास बेहद खूबसूरत सफ़ेद रंग के फूल खिलते है। पारिजात के फूल केवल रात कि खिलते है और सुबह होते ही मुरझा जाते है। 

इन फूलों का लक्ष्मी पूजन में विशेष महत्तव है। पर एक बात ध्यान रहे कि पारिजात वृक्ष के वे ही फूल पूजा में काम लिए जाते है जो वृक्ष से टूट कर गिर जाते है, वृक्ष से फूल तोड़ने कि मनाही है।

पारिजात वृक्ष का वर्णन हरिवंश पुराण में भी आता है। हरिवंश पुराण में इसे कल्पवृक्ष कहा गया है जिसकी उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी और जिसे इंद्र ने स्वर्गलोक में स्थपित कर दिया था।

हरिवंश पुराण के अनुसार इसको छूने मात्र से ही देव नर्त्तकी उर्वशी कि थकान मिट जाती थी।

*** पारिजात वृक्ष के किंटूर पहुंचने की कहानी !!!

एक बार देवऋषि नारद जब धरती पर कृष्ण से मिलने आये तो अपने साथ पारिजात के सुन्दर पुष्प ले कर आये।  उन्होंने वे पुष्प श्री कृष्ण को भेट किये।

श्री कृष्ण ने पुष्प साथ बैठी अपनी पत्नी रुक्मणि को दे दिए।

लेकिन जब श्री कृष्ण कि दूसरी पत्नी सत्य भामा को पता चला कि स्वर्ग से आये पारिजात के सारे पुष्प श्री कृष्ण ने रुक्मणि को दे दिए तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने श्री कृष्ण के सामने जिद पकड़ ली कि, उन्हें अपनी वाटिका के लिय  पारिजात वृक्ष चाहिए। 

श्री कृष्ण के लाख समझाने पर भी सत्य भामा नहीं मानी।

सत्यभामा कि ज़िद के आगे झुकते हुए श्री कृष्ण ने अपने दूत को स्वर्ग पारिजात वृक्ष लाने के लिए भेजा पर इंद्र ने पारिजात वृक्ष देने से मना कर दिया। 

दूत ने जब यह बात आकर श्री कृष्ण को बताई तो उन्होंने स्व्यं ही इंद्र पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को पराजित करके पारिजात वृक्ष को जीत लिया।

इससे रुष्ट होकर इंद्र ने पारिजात वृक्ष को फल से वंचित हो जाने का श्राप दे दिया और तभी से पारिजात वृक्ष फल विहीन हो गया।

श्री कृष्ण ने पारिजात वृक्ष को ला कर सत्यभामा कि वाटिका में रोपित कर दिया, पर सत्यभामा को सबक सिखाने के लिया ऐसा कर दिया कि, जब पारिजात वृक्ष पर पुष्प आते तो गिरते वो रुक्मणि कि वाटिका में। 

और यही कारण है कि, पारिजात के पुष्प वृक्ष के नीचे न गिरकर वृक्ष से दूर गिरते है। इस तरह पारिजात वृक्ष , स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गया।

*** महाभारत काल से किंटूर के पारिजात वृक्ष का संबंध !!!

इसके बाद जब पाण्डवों ने किंटूर में अज्ञातवास किया तो उन्होंने वहाँ माता कुन्ती के लिए भगवन शिव के एक मंदिर कि स्थापना कि जो कि, अब कुन्तेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। 

कहते है कि, माता कुन्ती पारिजात के पुष्पों से भगवान् शंकर कि पूजा अर्चना कर सके इसलिए पांडवों ने सत्यभामा कि वाटिका से पारिजात वृक्ष को लाकर यहाँ स्थापित कर दिया और तभी से पारिजात वृक्ष यहाँ पर है।

*** अन्य किवंदतियां भी है पारिजात वृक्ष के बारे में !!!

एक अन्य मान्यता यह भी है कि, पारिजात नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी, जिसे भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था।

लेकिन अथाग प्रयास करने पर भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्रेम कों स्वीकार नहीं किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने आत्महत्या कर ली।

जिस स्थान पर पारिजात की क़ब्र बनी, वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया।

*** सरकार द्वारा पारिजात वृक्ष पर जारी डाक टिकट !!!

पारिजात वृक्ष के ऐतिहासिक महत्तव व इसकी दुर्लभता को देखते हुए सरकार ने इसे संरक्षित घोषित कर दिया है। भारत सरकार ने इस पर एक डाक टिकट भी जारी किया है।

*** औषधीय गुणों से भी भरपूर है पारिजात वृक्ष !!!

पारिजात को आयुर्वेद में हरसिंगार भी कहा जाता है। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलों के रस का सेवन किया जाए तो हृदय रोग से बचा जा सकता है।

इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खाँसी ठीक हो जाती है।

इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते हैं।

पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोंपल को यदि पाँच काली मिर्च के साथ महिलाएँ सेवन करें तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है।

वहीं पारिजात के बीज जहाँ बालों के लिए शीरप का काम करते हैं तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर दे|

Monday, January 14, 2019

जानिये क्या है फिलिप कोटलर पुरस्कार Philip Kotler Award

फिलिप कोटलर Phillip Kotler


फिलिप कोटलर, जिन्हें 'आधुनिक विपणन के पिता' के रूप में भी जाना जाता है, नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी, केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में मार्केटिंग के प्रोफेसर हैं। वह 60 से अधिक मार्केटिंग पुस्तकों के विश्व-प्रसिद्ध लेखक भी हैं, जिसमें बेस्टसेलिंग बुक प्रिंसिपल्स ऑफ मार्केटिंग भी शामिल है।

प्रबंधन और विपणन पर पुस्तकों के अलावा, 87 वर्षीय ने शिक्षा, पर्यावरण, सरकारी विपणन, स्वास्थ्य सेवा, आतिथ्य और नवाचार पर भी विस्तार से लिखा है।

वह अमेरिकन मार्केटिंग एसोसिएशन से "लीडर इन मार्केटिंग थॉट" पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति थे और अपने शानदार करियर में 22 मानद उपाधियाँ प्राप्त की।


पुरस्कार के बारे में -
विपणन और प्रबंधन के क्षेत्र में महारत हासिल करने के लिए कोटलर अवार्ड का विकास किया गया। यह दुनिया भर के विभिन्न उद्योगों में संगठनों, विपणन टीमों और व्यक्तियों की उपलब्धियों को पहचानता है और मनाता है

यह पुरस्कार, जो कि आधुनिक विपणन के पिता, फिलिप कोटलर को एक श्रद्धांजलि है, का उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों और कंपनियों के उदाहरणों का प्रसार करना है जो किसी उद्योग या देश की आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी प्रगति के लिए अभिनव संस्कृति का निर्माण करते हैं।

व्यक्तियों और कंपनियों को सम्मानित करने के अलावा, पुरस्कार नई प्रतिभाओं और अद्वितीय नवाचारों को प्रदर्शित करने के लिए एक मंच के रूप में भी काम करता है जो एक उद्योग में उच्च मानकों को निर्धारित करता है।

Saturday, January 12, 2019

हिंदुत्व - एक जीवनपद्धति

हिंदुत्व - एक जीवनपद्धति

आज से लगभग 6000 वर्ष पहले सम्पूर्ण विश्व में केवल एक ही धर्म था जिसका नाम सनातन धर्म धर्म था और जिसे वैदिक धर्म भी कहा जाता था | सनातन वैदिक धर्म का सीधा मतलब यही था कि  वेदों में बताये गये तरीके से जीवन जीना | वैदिक मार्ग जो जो मानव जीवन को हर तरह से उत्कर्ष पर ले जाने का एकमात्र माध्यम था और है | तब सम्पूर्ण विश्व में केवल दो जातियाँ थी एक आर्य जो वेदमार्गी थे दूसरे अनार्य जो वेद का अनुसरण नही करते थे |
सवाल उठता है की वेद क्या हैं?  इन्हें किसने लिखा?
वेद जो कि सनातन धर्म का मूल हैं सर्वशक्तिमान ईश्वर से अपने आप प्रकट ग्रंथ हैं जिनका रचयिता कोई नहीं है वे परमात्मा से प्रकट भगवद् अंश हैं | लोगों में गलतफहमी है कि महर्षि वेद व्यास जी ने वेदों की रचना की |जबकि सत्यता यह है कि वेद महर्षि वेद व्यास के जन्म के हजारों लाखों साल पहले से ही उपलब्ध हैं |हमारी परम्परा में वेदों को भगवान से उत्पन्न होने के कारण वेद भगवान कहा जाता है उसमें कही गयी हर बात को भगवान की बात माना जाता है |
चूंकि वेदमार्ग का पालन कठिन है और मानवता की सहज प्रवृति है कि सरल की तरफ आकर्षित होना इसलिए लोग वेदमार्ग को त्यागते गये|
हमारे वेद सम्पूर्ण ज्ञान विज्ञान के उद्गम स्थल हैं | वेदों से अनेक उपनिषद निकले हैं | वेदों से अठारह पुराण निकले हैं | अनेक अन्य ग्रंथ जो कि हमारे महान विद्वान महर्षियों द्वारा रचे गये हैं वे वेदों को प्रमाण मानकर ही लिखे गये हैं | जो ज्ञान विज्ञान पूर्व में रहा, या वर्तमान में है अथवा भविष्य में होगा अगर हम खोज सकें तो वेदों में पहले से मिलेगा| चूंकि वेद संस्कृत भाषा में हैं और संस्कृत भाषा के प्रामाणिक विद्वानो की दिनोदिन कमी हो रही है अत: वेदों को पढना समझना बहुत कठिन है |कुछ लोग अनर्गल व्याख्या करके उसमें त्रुटि पैदा करने का षडयंत्र रच रहे हैं |
अनेक आघातों को सहते हुये भी हमारी संस्कृति हमारी परंपरा अगर अबतक बची है तो उसका एकमात्र कारण है हमारी अत्यंत पवित्र गुरू शिष्य परंपरा |गुरू शिष्य परंपरा में गुरू अपने योग्य शिष्य को योग्यतानुसार अपने आचार्यों से प्राप्त तथा खुद के आत्मचिंतन से तैयार ज्ञान विज्ञान अपने शिष्य को प्रदान करता है तथा शिष्य उसे कालक्रम में आगे बढाता है | मैकाले ने इस परंपरा को सुनियोजित तरीके से खत्म करने का षडयंत्र रचा जिसके तहत आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली विकसित की गयी|
विंध्याचल और हिमालय पर्वत के बीच की जगह को प्राचीन काल में आर्यावर्त कहा जाता था हिमालय के उत्तर को सिंध कहा जाता था | जब अंग्रेज आये तो उन्होने हिमालय और हिंद महासागर के बीच के क्षेत्र को हिंद कहा और यहां पर रहने वाले लोगों को हिंदू कहा हिंद शब्द धीरे धीरे इंड हो गया और इस इस क्षेत्र का नाम इंडिया हो गया |
हिंदू जो कि मूल रूप से सनातन धर्म की आधुनिक रूपांतरण है और हिंदुत्व उस महान परंपरा की जीवन शैली है| हमारे धर्म ग्रंथों में जीवन के हर पहलू को वैज्ञानिक, सामाजिक, सामयिक और तार्किक तरीके से समझाया गया है | हमारे ग्रंथ हमें सुबह सोकर उठने से लेकर रात में सोने तक कौन सा कार्य कैसे करना है बताते हैं |हमें कैसे सोना चाहिए, कैसे जागना चाहिए, कैसे बोलना चाहिए, कैसे सुनना चाहिए, कैसे चलना चाहिए , कैसे रूकना चाहिये ,कैसे खाना चाहिये, क्या खाना चाहिए, क्यों खाना चाहिए, किससे दूर रहना चाहिए, किसके संग रहना चाहिए, कब कब क्या करना चाहिए, कब कब क्या क्या नहीं करना चाहिए आदि अनेक बातों को अत्यंत वैज्ञानिक आधार पर बताते हैं |हमारे यहां पानी पीने खाना खाने से लेकर मलमूत्र विसर्जन तक की विधि ग्रंथों में बताई गयी है |हमारे पूर्वज इसी परंपरा से जीवन जीने के अभ्यस्त थे जिन्हें हिंदू तथा जिनकी जीवन पद्धति को हिन्दुत्व कहा गया |हमारी हिंदुत्व परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन परंपरा है |दुनिया की समस्त सभ्यताओं ने हमसे कुछ न कुछ सीखा जरूर है | हमारी सभ्यता दुनिया में सबसे ज्यादा आघात सहने वाली सभ्यता है |दुनिया में कितनी सभ्यतायें बनी और मिट गयीं एक मात्र हिंदुत्व की सभ्यता है जो सनातन काल से आजतक अपना गौरव बचाने में समर्थ रही है जो कि श्रेष्ठ है |
हमारी सामर्थ्य का प्रमाण यह है कि हम अनंत आघातो को सहकर भी बचे हैं |
विश्व में कोई सभ्यता तभी चिर काल तक टिकती है जब वह वैज्ञानिक, तार्किक, दार्शनिक, भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और सामयिक परिस्थितियों को आत्मसात कर अपनी प्रासंगिकता को प्रमाणित करती है और हमारा हिन्दुत्व इसपर शत् प्रतिशत खरा उतरता है |
हमारी समृद्धि का प्रमाण यह है कि विश्व की समस्त सभ्यताओं ने हमसे कुछ न कुछ सीखा जरूर है |
हमरी श्रेष्ठता का प्रमाण यह है कि सबने हमको मिटाने की कोशिश की परंतु हम बचे हैं |
हमारी सहिष्णुता का प्रमाण यह है कि हमने किसी पर आक्रमण नही किया |
हमारी उदारता का प्रमाण यह है कि हमने सबको स्वीकार किया |
जहां आज तथाकथित आधुनिक पश्चिमी सभ्यता दुनिया को बाजार मानती है वहीं हमारा हिंदुत्व दुनिया को परिवार मानता है |हिंदू दुनिया की एकमात्र ऐसी कौम है जो समस्त धर्मों के धर्मस्थलों पर जाती है सबको समान आदर देती है |हमारे यहाँ पेड़ पौधे पर्वत पठार पशु पक्षी नदी सागर स्त्री पुरुष सबको भगवान मानकर पूजा जाता है |हम विश्व बंधुत्व की अवधारणा को मानते हैं |हमने कण कण में भगवान को माना है |हमारे यहाँ अनेक मान्यताएँ है सगुण भी निर्गुण भी, मायावादी भी हैं तत्ववादी भी सबको बराबर सम्मान मिलता है |अनंत काल से अनेक सभ्यतायें बनी और नष्ट हुईं परंतु सनातन वैदिक सभ्यता जिसे कालांतर में हिंदुत्व कहा गया तब भी थी आज भी है और भविष्य में भी रहेगी |हमें अपने हिंदू होने पर और अपने हिंदुत्व पर गौरवान्वित होना चाहिए |

Thursday, January 10, 2019

Shri Ram is the today's most relevant relevance

In the Hindu way, Ram is the culmination of the ideal. He is the peak pillar of our faith. Nobody ignores Ram.In the whole world, Lord Rama is the highest peak in the form of an undisputed standard of ideal, the ideal set by which it is exemplary for everyone.
Today the family is breaking down, the brother and brother has become the enemy, the son does not respect the parents, the only solution is that we follow the ideals established by Shri Ram Ji. Lord Shree Ram is also called as 'Maryada Purushottam' because he has perfected and established many family, political, social, religious and moral responsibilities in ideal way. When Lord Rama is the king, then do not even take a moment to abandon his wife,when Lord Rama is a husband he never see other women throughout life, Lord Ram also establishes an ideal in the form of a brother, how does friendship play Lord Rama Teaches us.When Lord Ram is a judge then he does not make any difference in normal people and Laxman.
Hindus consider them as adorable; other religions even accept them as least a great man. In total, the acceptance of Ram is everywhere, which is very necessary in today's life. Every Indian sees Lord Ram as an ideal adoration, who did not use his divine Bhagavadian powers throughout his life and lived as a normal humanity.
The ideal established by Ram Ji in today's times is very relevant and very important.
We have to be good friends so Ram is important
We have to become good sons, then Ram is necessary.
We have to become good father so Ram is necessary
We need to become a good husband, then Ram is necessary.
We have to be good friends so Ram is important
We need to be a good leader, then Ram is necessary.
We need to be a good judge, then Ram is necessary.
We have to become good rulers so Ram is necessary
If we are to become the best person then Ram is necessary.
Jai Shri Ram |

Tuesday, January 8, 2019

Why reservation is necessary for poor upper-class ?

Why reservation is necessary for poor upper-class ?

After India's independence in 1947, India got its independent constitution. This Constitution is committed to the citizens of entire country to provide equality rights in every field. Through our Constitution, we have the right that we have the freedom to live our tradition and life of our culture everywhere in the country.
Before our independence, our country was divided into small states, which had their domination according to their geographical status. Since the ancient India, there was a Varna system since ancient times, according to which the society was divided into four classes, certain tasks of four classes were fixed, such as Brahmin Reading and Teaching , Kshatriyas in governance, Vaishya trade etc. and Shudras to serve . Initially, every class was considered equal, but gradually the distortions began to come in society, which in turn resulted in form of harassment of sudras, which was on top till independence. After our independence, our law-makers thought that everyone should get proper opportunity. And those who are weaker sections need special attention. But at that time it was a misconception that poverty was only in people of special class and those people of particular classes were given some comfort and special opportunity in form of reservation . Under which he had some concession in qualification. Slowly other poor castes also started demanding reservation; some of them got some struggle still.
On the basis of reservation, the country was classified into three parts: Scheduled Caste and Scheduled Tribe, Backwards and general Classes.General classes are those,
among them, the reservation was not received in any area. The society has been expressing its grief. Political parties were also talking about it in closed rooms but no one spoke openly. Reservations for political parties became a matter of vote and political parties roamed it.
The fundamental objective of reservation was to help to the poors and the inferior sections  but it lost their goal, the beneficiaries would consider it as their right. Of course, those who are weak should get reservation indisputably, but those who are capable and rich are getting benefits on the basis of the caste .
The truth is that the poors & richs are in every caste, their ratio can vary. There are also many poors in upper caste society. There are many such families who do not have a house to live, not wearing clothes, there is no money to study but due to the existence of upper caste they do not get any help. The upper caste society is very unhappy with its ignorance that no one is listening to his pain, and his misery increases further when he sees that by facing all the difficulties, if he does not pass after getting eighty marks in any examination and A caste special, which is of a capable family, passes on the strength of reservation by bringing fifty-five marks.
Reservations should be received but those who are really needing a reservation should be of any caste, class, religion and community.

Saturday, January 5, 2019

श्री राम सबसे प्रासंगिक प्रासंगिकता

हिंदू जनमानस में राम आदर्श की पराकाष्ठा हैं वे हमारी आस्था के शिखर स्तम्भ हैं | कोई भी राम की उपेक्षा नही करता |सम्पूर्ण विश्व में भगवान श्री राम निर्विवाद रूप से सर्वमान्य आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित सर्वोच्च शिखर हैं जिनके द्वारा स्थापित आदर्श सबके लिये अनुकरणीय है |
आज परिवार टूट रहा है भाई भाई का दुश्मन हो गया है पुत्र माता पिता का सम्मान नही करते इसका मात्र एक ही उपाय है कि हम श्री राम जी द्वारा स्थापित आदर्शों का अनुसरण करें| भगवान श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है क्योंकि उन्होने तमाम पारिवारिक, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक और नैतिक जिम्मेदारियों को आदर्शरूप में ख्यापित और स्थापित किया| भगवान राम जब राजा होते हैं तो पत्नी को त्यागने में पल भर भी नहीं लगाते,  भगवान राम जब पति होते हैं तो जीवन भर एकपत्नी व्रत धारण करते हैं, भगवान राम भाई के रूप में भी आदर्श स्थापित करते हैं,  मित्रता कैसे निभती है भगवान राम सिखाते हैं | न्याय करते हैं तो सामान्य प्रजा और लक्ष्मण में कोई फर्क नहीं करते |
हिंदू उन्हे आराध्य मानता है अन्य धर्म भी उन्हें कम से कम महापुरुष के रूप मे स्वीकार तो करते ही हैं कुल मिलाकर राम की स्वीकार्यता हर जगह है जो कि आज के जीवन में बहुत ही आवश्यक है | हर भारतीय भगवान श्री राम को आदर्श आराध्य के रूप में देखता है जिन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में अपनी दिव्य भगवदीय शक्तियों का उपयोग नहीं किया और सामान्य मानविकी की तरह जीवन यापन करते रहे|
आज के समय में राम जी द्वारा स्थापित आदर्श बहुत ही प्रासंगिक है और बहुत जरूरी है |
हमें अच्छा मित्र बनना है तो राम जरूरी हैं
हमें अच्छा पुत्र बनना है तो राम जरूरी हैं
हमें अच्छा पिता बनना है तो राम जरूरी हैं
हमें अच्छा पति बनना है तो राम जरूरी हैं
हमें अच्छा मित्र बनना है तो राम जरूरी हैं
हमे अच्छा नेता बनना है तो राम जरूरी हैं
हमें अच्छा न्यायाधीश बनना है तो राम जरूरी हैं
हमें अच्छा शासक बनना है तो राम जरूरी हैं
इन सबसे बढकर अगर हमें अच्छा इंसान बनना है तो राम जरूरी हैं |
जय श्री राम |

Thursday, January 3, 2019

राघवयादवीयम्

" दक्षिण का एक ग्रन्थ "

क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े
तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे।

जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। 


इस ग्रन्थ को
‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे
पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और
विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक।

पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।"

उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

अर्थातः
मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो
जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।

विलोमम्:

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

अर्थातः
मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के
चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ
विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।

 " राघवयादवीयम" के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-

राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

विलोमम्:
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।
पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥

विलोमम्:
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।
राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥

कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।
सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥

विलोमम्:
भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।
कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥

रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।
नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥

विलोमम्:
यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।
तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥

यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥

विलोमम्:
तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।
सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥

मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।
काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥

विलोमम्:
तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।
तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥

रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।
कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥

विलोमम्:
मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।
तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥

सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।
साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥

विलोमम्:
हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।
यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥

सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।
सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥

विलोमम्:
सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।
यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥

तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।
यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥

विलोमम्:
हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।
सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।
भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥

विलोमम्:
सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।
होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥

यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।
सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥

विलोमम्:
भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।
वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥

रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।
यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥

विलोमम्:
नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।
हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥

यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।
सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥

विलोमम्:
यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।
गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥

दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।
ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥

विलोमम्:
नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥

सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।
तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥

विलोमम्:
हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।
जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥

सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।
न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७ विलोमम्:
तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।
सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥

तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।
वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥

विलोमम्:
केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।
ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥

गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।
सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥

विलोमम्:
हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।
यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥

हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।
राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥

विलोमम्:
घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।
धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥

ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।

हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि  ॥ २१॥

विलोमम्:
विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।
ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥

भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।
चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥

विलोमम्:
ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।
हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥

हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।
तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥

विलोमम्:
योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।
जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥

भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।
तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥

विलोमम्:
विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।
तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥

हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।
राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥

विलोमम्:
यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।
निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥

सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।
तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥

विलोमम्:
जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।
हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥

वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।
तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥

विलोमम्
नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।
सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥

हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।
चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥

विलोमम्
हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।
सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥

नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।
रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥

विलोमम्:
नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।
कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥

साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥
निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥

विलोमम्:
भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।स
गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥

॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री  ।।
https://priyakripa.blogspot.com/2019/01/blog-post.html
कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें की दुनिया में कहीं भी ऐसा नही पाया गया ग्रंथ है ।

शत् शत् प्रणाम
🙏
ऐसे रचनाकार को।

राधे राधे

Wednesday, January 2, 2019

इन्हे मंदिर नहीं बनाना था

रामचंद्र के नाम से इनको बस सत्ता हथियाना था
मंदिर नहीं बनाना था इन्हें मंदिर नहीं बनाना था
झूठे वादे झूठी बातें झूठी कसमें झूठे नारे
सत्ता को हथियाने के केवल हथकंडे थे सारे
इनको तो बस हिंदू जन को झूठा ख़्वाब दिखाना था
मंदिर नहीं
कभी बहाना बहुमत का कभी गठबंधन की मजबूरी
रामभक्ति नाम लिया और पोई सत्ता की पूरी
कभी कोर्ट कभी संविधान कभी विपक्ष निशाना था
मंदिर नहीं...
हिंदू जन की पीड़ा का बस इस्तेमाल किया इसने
मंदिर के निर्माण का नाटक बस बिकराल किया इसने
रैली सभायें नारे वादे बस हिंदू को भरमाना था
मंदिर....
हिंदू जन की पीड़ा से तुम तृणभर  भी अनजान नही
मंदिर से गद्दारी के फल का तुमको अनुमान नही
अवसर रोज नही मिलता है इनको यही बताना था
मंदिर नहीं... 
                        ------अवनीश द्विवेदी

Insurance is not investment

  Insurance is not investment. Insurance and investments are two different financial instruments that serve different purposes. Insurance ...